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Madhumad Sarang

  • स्वर गंधार व धैवत वर्ज्य। निषाद कोमल। शेष शुद्ध स्वर। जाति औढव - औढव। थाट काफी। वादी/संवादी रिषभ/पंचम। समय अपराह्न। विश्रांति स्थान सा; प; - सा‘; प; । मुख्य अंग, नि१ सा रे; म रे; प म रे; नि१ प म रे; प म रे सा; । आरोह-अवरोह, नि१ सा; रे म प नि१ सा’ - सा′ नि१ प म रे सा; । विशेष - राग मधुमाद सारंग को मधमाद सारंग या मध्यमादी सारंग भी कहा जाता है। इस राग के स्वर राग बृंदावनी सारंग के ही सामान है परन्तु इस राग में सिर्फ कोमल निषाद का प्रयोग किया जाता… (145 more words) …

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