CBSE-NET (Based on NTA-UGC) Hindustani Music (Paper-II) Applied Theory-Detailed and Critical Study of Ragas Revision (Page 47 of 52)

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राग वाचस्पती

स्वर आरोह में रिषभ व धैवत वर्ज्य। निषाद कोमल, मध्यम तीव्र। शेष शुद्ध स्वर। जाति औढव - सम्पूर्ण। समय दिन का चतुर्थ प्रहर। विश्रांति स्थान ग; प; नि१; - ध; प; ग; रे; मुख्य अंग, नि१ सा ग म्; प ध प; म् ग रे सा; रे, नि१ सा; म् ग रे सा; आरोह-अवरोह सा ग म् प नि१ सा′ - सा′ नि१ ध प म् ग रे सा; , नि१ सा; विशेष - राग वाचस्पती कर्नाटक संगीत से लिया गया राग है। राग मारू बिहाग में निषाद कोमल करने से राग वाचस्पती बनता है। यह एक बहुत ही मधुर लेकिन अप्रचलित राग है।

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राग भटियार

  • स्वर मध्यम दोनों। रिषभ कोमल। शेष शुद्ध स्वर।

  • जाति सम्पूर्ण - सम्पूर्ण वक्र। थाट मारवा। वादी/संवादी शुद्ध मध्यम/षड्ज। समय रात्रि का अन्तिम प्रहर। विश्रांति स्थान सा; म; प; ध; - म; सा; मुख्य अंग सा म प; प ग रे१ सा; सा ध नि ध; नि प; ध म; प ग; प ग रे१ सा; म् ध सा′; आरोह-अवरोह सा रे१ सा; सा म; म ध प; सा ध; ध नि प म; प ग; म् ध सा′ - सा′ रे१′ नि ध प; ध नि प म; प ग रे१ सा; विशेष: राग भटियार मारवा ठाट से उत्पन्न राग है। सा ध; नि प; ध म; प ग; यह राग भटियार की राग वाचक स्वर संगतियाँ हैं। यह

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