NTA-NET (Based on NTA-UGC) Hindustani Music (Paper-II) Applied Theory-Detailed and Critical Study of Ragas Revision (Page 46 of 52)

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राग सोहनी (Raga Sohani)

  • स्वर आरोह में रिषभ व पंचम वर्ज्य, अवरोह में पंचम वर्ज्य। रिषभ कोमल, मध्यम तीव्र। शेष शुद्ध स्वर। जाति औढव-षाढव वक्र। थाट मारवा। वादी/संवादी धैवत/गंधार। समय रात्रि का चतुर्थ प्रहर। विश्रांति स्थान ग नि सा’- सा’ ध ग। मुख्य अंग म् ध नि सा′ रे१′ सा’; नि ध नि ध; आरोह-अवरोह सा ग म् ध नि सा’ - सा′ नि ध नि ध म् ग रे१ सा; विशेष - यह उत्तरांग प्रधान राग है। इसका विस्तार तार सप्तक में अधिक होता है। यदि इस राग का मंद्र सप्तक में विस्तार किया गया तो राग पूरिया दिखने लगता है और यदि रिषभ और धैवत क

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राग मालगुंजी (Raga Malgunji)

स्वर आरोह में पंचम वर्ज्य। निषाद कोमल, गंधार दोनों। शेष शुद्ध स्वर। जाति षाढव - सम्पूर्ण वक्र। थाट काफी। वादी/संवादी मध्यम/षड्ज। समय रात्रि का तीसरा प्रहर। विश्रांति स्थान म; सा; मुख्य अंग ग म ग१ रे सा; , नि१ सा; , ध, नि१ सा रे ग म; आरोह-अवरोह सा रे ग म ध नि१ सा′ - सा′ नि१ ध प म; ग१ रे; ग प म; ग१ रे ग म; ग१ रे सा; विशेष - यह बहुत ही मीठा राग है। यह बागेश्री से मिलता जुलता राग है। आरोह में शुद्ध गंधार लगाने से यह राग बागेश्री से अलग होता है। इसमें आरोह में शुद्ध गंधार और अवरोह में कोम

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