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राग जलधर केदार

  • स्वर गंधार व निषाद वर्ज्य। शेष शुद्ध स्वर। जाति औढव-औढव। थाट बिलावल। वादी/संवादी मध्यम/षड्ज। समय रात्रि का दूसरा प्रहर। विश्रांति स्थान म; सा; मुख्य अंग सा रे सा म; म रे प म; म प ध सा′; रे′ सा′ ध प म; प म रे सा; आरोह-अवरोह सा रे सा म; म रे प म; म प ध सा′ - सा′ ध प म; प म रे सा; विशेष - यह केदार अंग का राग है। इस राग में राग दुर्गा के स्वर होते हुए भी राग केदार दिखाया जाता है। केदार का अंग स्पष्ट दिखाने के लिये इसमें मध्यम… (172 more words) …

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राग पूर्वी

  • स्वर मध्यम दोनों। रिषभ व धैवत कोमल। शेष शुद्ध स्वर। जाति सम्पूर्ण - सम्पूर्ण वक्र। थाट पूर्वी। वादी/संवादी गंधार/निषाद। समय दिन का चतुर्थ प्रहर। विश्रांति स्थान सा ग प - सा′ प ग। मुख्य अंग, नि रे१ ग; म् ग म ग; म् ध१ प; नि ध१ प; ग म् ध१; म् ग म ग; आरोह-अवरोह, नि रे१ ग म् प ध१ नि सा′ - सा′ नि ध१ प; म् ग म ग रे१ सा; , नि रे१ सा; विशेष - राग पूर्वी सायंकाल संधि प्रकाश के समय गाया जाने वाला राग है। यह पूर्वांग प्रधान राग है। इस राग… (302 more words) …

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