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राग बिहाग

  • स्वर आरोह में रिषभ और धैवत वर्ज्य। मध्यम दोनों। शेष शुद्ध स्वर। जाति औढव - सम्पूर्ण वक्र। थाट कल्याण। वादी/संवादी गंधार/निषाद। समय रात्रि का दूसरा प्रहर। विश्रांति स्थान सा; ग; प; नि; - सा‘; नि; प; ग; मुख्य अंग, नि सा ग; ग म ग; प म् प ग म ग; प म् ग म ग रे सा; आरोह-अवरोह सा ग म प नि सा’ - सा′ नि ध प म् ग म ग रे सा; विशेष - राग बिहाग अत्यंत ही प्रचलित और मधुर राग है। प म् ग म यह स्वर समुदाय राग वाचक है। आरोह में मध्यम… (149 more words) …

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राग देवश्री

  • स्वर गंधार व धैवत वर्ज्य। मध्यम तीव्र, निषाद कोमल। शेष शुद्ध स्वर। जाति औढव - औढव। समय रात्रि का दूसरा प्रहर। विश्रांति स्थान रे; म्; प; नि१; - नि१; प; म्; रे; मुख्य अंग रे म् प; म् प नि१ प; म् रे सा; , नि१, प, नि१ सा; आरोह-अवरोह सा रे म् प नि१ सा′ - सा′ नि१ प म् रे सा; विशेष - यह अपेक्षाकृत नया, मधुर और अप्रचलित राग है। इस राग में कोई वक्रता नही है। यह तीनों सप्तकों में उन्मुक्त रूप से गाया जा सकता है।

  • राग मेघ मल्हार के स्वरों में यदि मध्यम शुद्ध… (79 more words) …

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