CBSE-NET (Based on NTA-UGC) Hindustani Music (Paper-II) Applied Theory-Detailed and Critical Study of Ragas Revision (Page 44 of 52)

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राग लंका-दहन सारंग

  • स्वर आरोह में गंधार व धैवत वर्ज्य। अवरोह में गंधार कोमल। निषाद दोनों। शेष शुद्ध स्वर।

  • जाति औढव - सम्पूर्ण वक्र। समय दिन का दूसरा प्रहर। विश्रांति स्थान रे; प; सा′ - सा’; प; रे; मुख्य अंग म प सा’; नि१ प; म प; रे ग१ रे सा; , नि१, प, म, प, नि सा; आरोह-अवरोह सा रे म प नि सा’ - सा′ नि१ ध प; म प ध प; ग१ रे ग१ रे सा, नि सा; विशेष- यह सारंग का प्राचीन प्रकार है जो की वर्त्तमान में अधिक प्रचलन में नहीं है। राग वृंदावनी सारंग के अवरोह में धैवत और कोमल गंधार का उपयोग होने से इस राग का स्वरु

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राग देस

  • स्वर आरोह में गन्धार, धैवत वर्ज्य। निषाद दोनों। शेष शुद्ध स्वर। जाति औढव - सम्पूर्ण वक्र। थाट खमाज। वादी/संवादी रिषभ/पंचम। समय रात्रि का दूसरा प्रहर। विश्रांति स्थान रे; प; नि; सा’; - सा’; प; रे; मुख्य अंग ध म ग रे; ग, नि सा; रे म प नि; सा’ रे′ नि१ ध प। आरोह-अवरोह सा रे म प नि सा′ - सा′ नि१ ध प ध म ग रे ग, नि सा; विशेष - यह बहुत ही मधुर राग है और ध म ग रे; ग, नि सा; इन स्वरों से पहचाना जाता है।

  • इस राग में षड्ज-मध्यम और षड्ज-पंचम भाव होने से यह बहुत ही कर्णप्रिय है। यह स्वर संगति

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