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राग देव गन्धार (राग द्वि गंधार)

  • स्वर धैवत, निषाद कोमल, गंधार दोनों। शेष शुद्ध स्वर। जाति सम्पूर्ण - सम्पूर्ण वक्र। थाट आसावरी। वादी/संवादी धैवत/गंधार। समय दिन का दूसरा प्रहर। विश्रांति स्थान ग; म; प; - सा‘; प; रे; मुख्य अंग, ध१, नि१ सा रे ग म ग म; ध१ म प नि१ ध१ प; ध१ म प ग रे सा; रे ग म; प ग रे सा; ध१ म प ग१ रे ग म ग१ रे सा; आरोह-अवरोह सा रे ग म प म ग१ रे ग म प ध१ नि१ सा’ - सा′ नि१ ध१ प म प ग१ रे ग म ग१ रे सा;… (168 more words) …

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राग सुन्दरकौंस

  • स्वर रिषभ व पंचम वर्ज्य। गंधार व निषाद कोमल। शेष शुद्ध स्वर। जाति औढव - औढव। समय रात्रि का दूसरा प्रहर। विश्रांति स्थान सा; म; ध; - सा‘; ध; म; मुख्य अंग, नि१, नि१, ध; , ध, नि१ सा; ग१ म ग१ सा; ग१ म ध; नि१ ध; म ध नि१ सा’; सा′ ध नि१ ध म ग१ सा; आरोह-अवरोह सा ग१ म ध नि१ सा′ - सा′ नि१ ध म ग१ म ग१ सा, नि१ सा; विशेष - यह राग बहुत ही प्रभावी और चित्ताकर्षक है। राग मालकौंस के कोमल धैवत की जगह जब शुद्ध धैवत का प्रयोग होता… (246 more words) …

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