CBSE-NET (Based on NTA-UGC) Hindustani Music (Paper-II) Applied Theory-Detailed and Critical Study of Ragas Revision (Page 42 of 52)

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राग श्री

  • स्वर आरोह में गंधार व धैवत वर्ज्य। रिषभ व धैवत कोमल, मध्यम तीव्र। शेष शुद्ध स्वर। जाति औढव - सम्पूर्ण वक्र। थाट पूर्वी। वादी/संवादी रिषभ/पंचम। समय दिन का अन्तिम प्रहर (सूर्यास्त) । विश्रांति स्थान सा; रे१; प; - प; रे१; सा; मुख्य अंग सा, नि रे१; रे१ रे१ प; म् पध१ म् ग रे१ ग रे१ सा; म् प नि सा′ रे१′; रे१′ नि ध१ प; म् ध१ म् ग रे१; ग रे१ सा; आरोह-अवरोह सा रे१ म् प नि सा′ - सा′ रे१′ नि ध१ प म् प ध१ म् ग रे१ सा; विशेष - राग श्री एक पुरुष राग है। भारतीय संगीत शास्त्रों में 6 पुरुष राग और

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राग देसी

स्वर आरोह में गंधार, धैवत वर्ज्य। अवरोह में निषाद वर्ज्य। गंधार, निषाद कोमल। शेष शुद्ध स्वर। जाति औढव - षाढव वक्र। थाट काफी। वादी/संवादी पंचम/षड्ज। समय दिन का प्रथम प्रहर। विश्रांति स्थान सा; रे; प; - सा; प; रे; मुख्य अंग रे म प; ध म प सा′; सा′ प ध म प; रे ग१ सा रे, नि१ सा; आरोह-अवरोह सा रे म प नि१ सा′ - सा′ प ध म प रे ग१ सा रे, नि१ सा; विशेष - यह स्वर संगतियाँ राग देसी का रूप दर्शाती हैं - रे म प ध; म प; रे ग१; सा रे; , नि१ सा

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