CBSE-NET (Based on NTA-UGC) Hindustani Music (Paper-II) Applied Theory-Detailed and Critical Study of Ragas Revision (Page 41 of 52)

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राग सूरदासी-मल्हार (राग सूर-मल्हार)

  • स्वर आरोह में गंधार व धैवत वर्ज्य, अवरोह में गंधार वर्ज्य। निषाद दोनों। शेष शुद्ध स्वर।

  • जाति औढव - षाढव वक्र। थाट काफी। वादी/संवादी मध्यम/षड्ज। समय वर्षा ऋतु। विश्रांति स्थान सा; रे; म; प; - सा’; प; म; रे; मुख्य अंग म रे, नि सा; सा’; नि१ ध म प नि१ ध प; म रे प म ध प; म रे, नि सा; आरोह-अवरोह सा रे म प नि सा′ - सा′ नि१ ध प; म ध प; नि१ ध प म रे; , नि सा; विशेष - राग सूरदासी-मल्हार में सारंग अंग और मल्हार अंग का मिश्रण है। आरोह में सारंग अंग जैसे - सा रे म प नि सा′ के साथ मल्हार अंग इ

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राग शहाना कान्हडा

  • स्वर गंधार व निषाद कोमल। शेष शुद्ध स्वर।

  • जाति सम्पूर्ण - सम्पूर्ण वक्र। थाट काफी। वादी/संवादी पंचम/षड्ज। समय रात्रि का तीसरा प्रहर। विश्रांति स्थान सा; प; ध; - सा’; ध; प; रे; मुख्य अंग प म ग१ म ध; ध नि१ प; सा’ ध नि१ प; ध म प ग१ म रे सा; आरोह-अवरोह, नि१ सा; रे ग१ म प; म ग१ म; ध नि१ प; म प ध नि१ सा′ - सा′ ध नि१ प; म प ग१ म रे सा; विशेष - राग शहाना कान्हड़ा में धैवत एक महत्वपूर्ण स्वर है जिस पर न्यास किया जाता है। अन्य न्यास स्वर पंचम है।

  • इस राग की राग वाचक स्वर संगती है - ग१ म ध;

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