NTA-NET (Based on NTA-UGC) Hindustani Music (Paper-II) Applied Theory-Detailed and Critical Study of Ragas Revision (Page 39 of 52)

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राग बिहाग (Raga Bihaga)

  • स्वर आरोह में रिषभ और धैवत वर्ज्य। मध्यम दोनों। शेष शुद्ध स्वर। जाति औढव - सम्पूर्ण वक्र। थाट कल्याण। वादी/संवादी गंधार/निषाद। समय रात्रि का दूसरा प्रहर। विश्रांति स्थान सा; ग; प; नि; - सा’; नि; प; ग; मुख्य अंग, नि सा ग; ग म ग; प म् प ग म ग; प म् ग म ग रे सा; आरोह-अवरोह सा ग म प नि सा’ - सा′ नि ध प म् ग म ग रे सा; विशेष - राग बिहाग अत्यंत ही प्रचलित और मधुर राग है। प म् ग म यह स्वर समुदाय राग वाचक है। आरोह में मध्यम से उठाव करते समय मध्यम तीव्र का प्रयोग होता है जैसे - म् प; म् प ध

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राग सुंदरकली (Raga Sundarkali)

स्वर मध्यम व धैवत वर्ज्य। रिषभ व निषाद कोमल। शेष शुद्ध स्वर। जाति औढव - औढव। समय दिन का दूसरा प्रहर। विश्रांति स्थान सा; ग; नि१; - नि१; प; ग; मुख्य अंग सा रे१ ग प नि१ प; ग प नि१; प ग रे१ सा; रे१ सा, नि१ सा रे१ सा; आरोह-अवरोह सा रे१ ग प नि१ सा′ - सा′ नि१ प ग; प ग रे१ सा; विशेष - राग सुंदरकली एक मधुर परंतु नया और अप्रचलित राग है। यह राग तीनों सप्तकों में उन्मुक्त रूप से गाया जाता है। यह स्वर संगतियाँ राग सुंदरकली का रूप दर्शाती हैं - सा रे१ ग प; प ग प ग रे१ सा; ग प नि१ प; प नि१ सा′; सा

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