CBSE-NET (Based on NTA-UGC) Hindustani Music (Paper-II) Applied Theory-Detailed and Critical Study of Ragas Revision (Page 38 of 52)

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राग मांड

  • स्वर सब शुद्ध स्वर - कोई वर्ज्य नहीं। जाति सम्पूर्ण - सम्पूर्ण वक्र। थाट बिलावल। वादी/संवादी षड्ज/पंचम। समय रात्री का दूसरा प्रहर। विश्रांति स्थान सा म प - सा′ ध म ग; मुख्य अंग ग म प ध सा′ नि ध; ध प म; म प; ग रे ग सा; आरोह-अवरोह सा रे ग म प ध नि प ध सा′ - सा′ नि ध प म ग रे ग सा; विशेष - राग मांड चंचल तथा क्षुद्र प्रक्रुति का, सुनने में सहज परंतु गायन वादन में कठिन राग है। मांड गायन वादन का विशेष प्रचार मारवाड में है। राजस्थान के अतिरिक्त गुजरात के गीत, लोकगीत आदि इस राग की लहरियों स

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राग परमेश्वरी

स्वर पंचम वर्ज्य। रिषभ, गंधार व निषाद कोमल। शेष शुद्ध स्वर। जाति षाढव - षाढव। समय दिन का दूसरा प्रहर। विश्रांति स्थान रे१; म; ध; - ध; म; रे१; मुख्य अंग सा रे१ ग१ म ध म; ग१ म ध म ग१ रे१; ग१ रे१, नि१, ध; , ध, नि१ रे१ सा; आरोह-अवरोह सा रे१ ग१ म ध नि१ सा′ - सा′ नि१ ध म ग१ रे१ सा; विशेष - यह राग पंडित रवि शंकर जी द्वारा रचित है। यह राग बहुत ही मधुर है लेकिन अप्रचलित है। इस राग का विस्तार तीनों सप्तकों में किया जा सकता है। यह स्वर संगतियाँ राग परमेश्वरी का रूप दर्शाती हैं - सा रे१ ग१ म; ग

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