CBSE-NET (Based on NTA-UGC) Hindustani Music (Paper-II) Applied Theory-Detailed and Critical Study of Ragas Revision (Page 35 of 52)

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राग कौशिक ध्वनि (राग भिन्न षड्ज)

  • स्वर रिषभ व पंचम वर्ज्य। शेष शुद्ध स्वर।

  • जाति औढव - औढव। थाट बिलावल। वादी/संवादी मध्यम/षड्ज। समय रात्रि का दूसरा प्रहर। विश्रांति स्थान सा; ग; म; ध; नि; मुख्य अंग ग म ध नि ध सा′; नि सा′ ध; ग म; ध म ग सा; आरोह-अवरोह सा ग म ध नि सा′ - सा′ नि ध म ग सा; विशेष - प्राचीन राग भिन्न-षड्ज को वर्तमान में कौशिक-ध्वनि के नाम से जाना जाता है। इसका वादी स्वर मध्यम होते हुए भी इसके बाकी स्वर भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं जिन पर ठहराव किया जा सकता है। इस कारण इस राग में विस्तार की पूर्ण स्वतंत्रता ह

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राग देवगिरि बिलावल

  • स्वर आरोह में मध्यम वर्ज्य। निषाद दोनों। शेष शुद्ध स्वर। जाति षाढव - सम्पूर्ण वक्र। थाट बिलावल। वादी/संवादी षड्ज/पंचम। समय दिन का प्रथम प्रहर। विश्रांति स्थान सा; ग; प; - प; ग; सा; मुख्य अंग सा; , ध, नि, ध सा रे ग; ग रे सा; , ध, प ग; , नि रे ग म ग; ग प म; ग रे सा; आरोह-अवरोह सा रे ग प ध नि सा′ - सा′ नि ध प; ध नि१ ध प; म ग रे सा; , नि सा; , ध, प ग रे सा; विशेष: राग देवगिरि बिलावल, शुद्ध कल्याण और बिलावल का मिश्रण है और साथ ही इसमें कल्याण अंग भी झलकता है।

  • इसमें तीव्र मध्यम का प्र

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