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राग सूरदासी-मल्हार (राग सूर-मल्हार)

  • स्वर आरोह में गंधार व धैवत वर्ज्य, अवरोह में गंधार वर्ज्य। निषाद दोनों। शेष शुद्ध स्वर।

  • जाति औढव - षाढव वक्र। थाट काफी। वादी/संवादी मध्यम/षड्ज। समय वर्षा ऋतु। विश्रांति स्थान सा; रे; म; प; - सा‘; प; म; रे; मुख्य अंग म रे, नि सा; सा’; नि१ ध म प नि१ ध प; म रे प म ध प; म रे, नि सा; आरोह-अवरोह सा रे म प नि सा′ - सा′ नि१ ध प; म ध प; नि१ ध प म रे; , नि सा; विशेष - राग सूरदासी-मल्हार में सारंग अंग और मल्हार अंग का मिश्रण है। आरोह… (174 more words) …

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BHIMPLASI

  • स्वर आरोह में रिषभ, धैवत वर्ज्य। गंधार, निषाद कोमल। शेष शुद्ध स्वर। जाति औढव - सम्पूर्ण। थाट काफी। वादी/संवादी मध्यम/षड्ज। समय दिन का तीसरा प्रहर। विश्रांति स्थान सा; म; प; - सा‘; प; म; । मुख्य अंग, नि१ सा ग१ म प; नि ध प; सा’; नि१ ध प; म ग१ रे सा; ।आरोह-अवरोह, नि१ सा ग१ म प नि१ सा′ - सा′ नि१ ध प म ग१ रे सा; , नि१ सा, प, नि१ सा; । विशेष: राग भीमपलासी दिन के रागों में अति मधुर और कर्णप्रिय राग है। इसके अवरोह में सातों स्वरों का प्रयोग किया जाता है।… (309 more words) …

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