CBSE-NET (Based on NTA-UGC) Hindustani Music (Paper-II) Applied Theory-Detailed and Critical Study of Ragas Revision (Page 34 of 52)

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राग देवसाख

स्वर आरोह में गन्धार, धैवत वर्ज्य। अवरोह में धैवत वर्ज्य। गन्धार, निषाद कोमल (क्वचित निषाद शुद्ध) । शेष शुद्ध स्वर। जाति औढव - षाढव वक्र। थाट काफी। वादी/संवादी पंचम/षड्ज। समय दिन का तीसरा प्रहर। आरोह-अवरोह सा रे म प नि१ सा′ - सा′ नि१ प म प ग१ म ग१ रे सा, नि१ सा;

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राग छायानट

  • स्वर मध्यम दोनों। शेष शुद्ध स्वर। जाति सम्पूर्ण - सम्पूर्ण वक्र। थाट कल्याण। वादी/संवादी पंचम/रिषभ। समय रात्रि का दूसरा प्रहर । विश्रांति स्थान रे; ग; प; - सा’; प; रे; मुख्य अंग, प रे रे; रे ग म प; ग म रे सा; सा’ प रे ग; म ग म रे सा रे सा; आरोह-अवरोह सा रे ग रे; ग प म ग रे सा; सा रे ग म प ध नि सा′ - सा′ नि ध प म् प ध प; रे ग म प म ग रे सा; विशेष - इस राग को राग छाया भी कहते हैं। यह छाया और नट रागों का मिश्रित रूप है। शुद्ध मध्यम का प्रयोग आरोह और अवरोह में समान रूप से किया जाता है।

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राग देवश्री

  • स्वर गंधार व धैवत वर्ज्य। मध्यम तीव्र, निषाद कोमल। शेष शुद्ध स्वर। जाति औढव - औढव। समय रात्रि का दूसरा प्रहर। विश्रांति स्थान रे; म्; प; नि१; - नि१; प; म्; रे; मुख्य अंग रे म् प; म् प नि१ प; म् रे सा; , नि१, प, नि१ सा; आरोह-अवरोह सा रे म् प नि१ सा′ - सा′ नि१ प म् रे सा; विशेष - यह अपेक्षाकृत नया, मधुर और अप्रचलित राग है। इस राग में कोई वक्रता नही है। यह तीनों सप्तकों में उन्मुक्त रूप से गाया जा सकता है।

  • राग मेघ मल्हार के स्वरों में यदि मध्यम शुद्ध की जगह मध्यम तीव्र का उपयोग किय

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