CBSE-NET (Based on NTA-UGC) Hindustani Music (Paper-II) Applied Theory-Detailed and Critical Study of Ragas Revision (Page 31 of 52)

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राग जोगेश्वरी

  • स्वर रिषभ व पंचम वर्ज्य। निषाद कोमल, दोनों गंधार। शेष शुद्ध स्वर। जाति औढव - औढव । समय रात्रि का दूसरा प्रहर। विश्रांति स्थान सा; ग म; ध; - ध; म; ग; सा; । मुख्य अंग सा ग म ग१ सा; , नि१, ध; , म, ध, नि१ सा; सा ग म; नि१ ध म; ध नि१ सा′; सा′ ध; नि१ म; ध ग; म ग१ सा;

  • आरोह-अवरोह सा ग म ध नि१ सा′ - सा′ नि१ ध म ग म ग१ सा; विशेष - पंडित रवि शंकर जी द्वारा बनाया गया राग जोगेश्वरी, अत्यंत मधुर और सीधा राग है। यह राग, पूर्वांग में राग जोग (सा ग म; ग म (सा) ग१ सा; ग१ सा, नि१; , नि१ सा सा ग; सा

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राग हंस किंकिणी

  • स्वर आरोह में रिषभ व धैवत वर्ज्य। दोनों गंधार व दोनों निषाद। शेष शुद्ध स्वर। जाति औढव - सम्पूर्ण वक्र। थाट काफी। वादी/संवादी पंचम/षड्ज। समय दिन का तीसरा प्रहर। विश्रांति स्थान रे; प; नि; - सा’; नि; प; रे; मुख्य अंग ग म ध प; म प ग१ रे सा; , नि सा ग म प प; म प; म नि१ ध प; ध प म प; ग म ध प ग१ रे सा; आरोह-अवरोह, नि सा ग म प नि सा’ - सा′ नि१ ध प म प ग म प ग१ रे सा, नि सा; विशेष - यह राग कम प्रचलन में है। इसके निकटतम राग हैं - राग प्रदीपकी, धनाश्री और भीमपलासी।

  • यह राग धनाश्री अंग से ग

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