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राग मालगुंजी

स्वर आरोह में पंचम वर्ज्य। निषाद कोमल, गंधार दोनों। शेष शुद्ध स्वर। जाति षाढव - सम्पूर्ण वक्र। थाट काफी। वादी/संवादी मध्यम/षड्ज। समय रात्रि का तीसरा प्रहर। विश्रांति स्थान म; सा; मुख्य अंग ग म ग१ रे सा; , नि१ सा; , ध, नि१ सा रे ग म; आरोह-अवरोह सा रे ग म ध नि१ सा′ - सा′ नि१ ध प म; ग१ रे; ग प म; ग१ रे ग म; ग१ रे सा; विशेष - यह बहुत ही मीठा राग है। यह बागेश्री से मिलता जुलता राग है। आरोह में शुद्ध गंधार लगाने से यह राग बागेश्री से अलग होता… (16 more words) …

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राग सुंदरकली

स्वर मध्यम व धैवत वर्ज्य। रिषभ व निषाद कोमल। शेष शुद्ध स्वर। जाति औढव - औढव। समय दिन का दूसरा प्रहर। विश्रांति स्थान सा; ग; नि१; - नि१; प; ग; मुख्य अंग सा रे१ ग प नि१ प; ग प नि१; प ग रे१ सा; रे१ सा, नि१ सा रे१ सा; आरोह-अवरोह सा रे१ ग प नि१ सा′ - सा′ नि१ प ग; प ग रे१ सा; विशेष - राग सुंदरकली एक मधुर परंतु नया और अप्रचलित राग है। यह राग तीनों सप्तकों में उन्मुक्त रूप से गाया जाता है। यह स्वर संगतियाँ राग सुंदरकली का रूप दर्शाती हैं -… (36 more words) …

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