CBSE-NET (Based on NTA-UGC) Hindustani Music (Paper-II) Applied Theory-Detailed and Critical Study of Ragas Revision (Page 23 of 52)

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Chandrakauns

  • स्वर रिषभ, पंचम वर्ज्य। गंधार, धैवत कोमल। शेष शुद्ध स्वर। जाति औढव - औढव। थाट किसी भी थाट के अंतर्गत नहीं। वादी/संवादी मध्यम/षड्ज। समय रात्रि का दूसरा प्रहर। विश्रांति स्थान सा; म; नि; - सा’; नि; म; मुख्य अंग सा ग१ म ग१ सा, नि; , नि सा; ग१ म ध१ नि सा’; नि ध१ सा′; नि ध१ म ग१ म ग१ सा, नि सा; आरोह-अवरोह सा ग१ म ध१ नि सा′ - सा′ नि ध१ म ग१ म ग१ सा, नि सा। विशेष - राग मालकौन्स के कोमल निषाद की जगह जब निषाद शुद्ध का प्रयोग होता है तब राग चन्द्रकौन्स की उत्पत्ति होती है। इस राग में शुद्ध नि

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राग मारूबिहाग

  • स्वर ॠषभ, धैवत वर्ज्य आरोह में। मध्यम तीव्र (क्वचित मध्यम शुद्ध) । शेष शुद्ध स्वर। जाति औढव - सम्पूर्ण। थाट कल्याण। वादी/संवादी पंचम/षड्ज। समय दिन का चौथा प्रहर। विश्रांति स्थान ग प नि - सा′ ध प ग रे। मुख्य अंग म् ग; म् ग रे सा; सा, नि सा; म ग प; म् ग म् ग रे सा; आरोह-अवरोह सा ग म् प नि सा′ - सा′ नि ध प म् ग म् ग रे सा; विशेष - राग मारूबिहाग बहुत ही सुन्दर राग है। म ग रे सा गाते समय रिषभ को सा का स्पर्श देना चहिये।

  • जैसे इस स्वर संगति मे दर्शाया गया है -, नि सा ग म् ग रे सा; ग म्

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