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राग बैरागी

  • स्वर गंधार और धैवत वर्ज्य। रिषभ और निषाद कोमल। शेष शुद्ध स्वर। जाति औढव - औढव। थाट भैरव। वादी/संवादी मध्यम/षड्ज। समय दिन का प्रथम प्रहर। विश्रांति स्थान सा; रे१; म; प; मुख्य अंग म प नि१ प म रे१; रे१ प म रे१ सा; , नि१ सा रे१ सा; आरोह-अवरोह सा रे१ म प नि१ सा′ - सा′ नि१ प म रे१ सा; विशेष - राग बैरागी को पंडित रवि शंकर जी ने प्रचलित किया है। यह बहुत ही कर्णप्रिय राग है और भक्ति रस से परिपूर्ण है।
  • इस राग में किसी भी तरह का बन्धन नही है, इसलिये यह… (79 more words) …

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राग परमेश्वरी

स्वर पंचम वर्ज्य। रिषभ, गंधार व निषाद कोमल। शेष शुद्ध स्वर। जाति षाढव - षाढव। समय दिन का दूसरा प्रहर। विश्रांति स्थान रे१; म; ध; - ध; म; रे१; मुख्य अंग सा रे१ ग१ म ध म; ग१ म ध म ग१ रे१; ग१ रे१, नि१, ध; , ध, नि१ रे१ सा; आरोह-अवरोह सा रे१ ग१ म ध नि१ सा′ - सा′ नि१ ध म ग१ रे१ सा; विशेष - यह राग पंडित रवि शंकर जी द्वारा रचित है। यह राग बहुत ही मधुर है लेकिन अप्रचलित है। इस राग का विस्तार तीनों सप्तकों में किया जा सकता है। यह… (41 more words) …

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