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Hansdhwani

  • स्वर मध्यम, धैवत वर्ज्य। शेष शुद्ध स्वर। जाति औढव - औढव। थाट बिलावल। वादी/संवादी षड्ज/पंचम। समय रात्रि का दूसरा प्रहर। विश्रांति स्थान ग प नि - सा′ नि प ग। मुख्य अंग, नि रे ग प ग रे ग प नि सा‘; सा’ नि प ग रे ग प ग रे सा। आरोह-अवरोह सा रे ग प नि सा′ - सा′ नि प ग रे सा, नि, प, नि रे सा; । विशेष - यह राग कर्नाटक संगीत पद्धति से हिन्दुस्तानी संगीत पद्धति में सम्मिलित किया गया है।
  • यह राग, राग शंकरा के करीब का राग है, पर इसमें धैवत… (96 more words) …

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राग लंका-दहन सारंग

  • स्वर आरोह में गंधार व धैवत वर्ज्य। अवरोह में गंधार कोमल। निषाद दोनों। शेष शुद्ध स्वर।

  • जाति औढव - सम्पूर्ण वक्र। समय दिन का दूसरा प्रहर। विश्रांति स्थान रे; प; सा′ - सा‘; प; रे; मुख्य अंग म प सा‘; नि१ प; म प; रे ग१ रे सा; , नि१, प, म, प, नि सा; आरोह-अवरोह सा रे म प नि सा’ - सा′ नि१ ध प; म प ध प; ग१ रे ग१ रे सा, नि सा; विशेष- यह सारंग का प्राचीन प्रकार है जो की वर्त्तमान में अधिक प्रचलन में नहीं है। राग वृंदावनी सारंग के अवरोह में… (226 more words) …

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