CBSE-NET (Based on NTA-UGC) Hindustani Music (Paper-II) Applied Theory-Detailed and Critical Study of Ragas Revision (Page 15 of 52)

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Vrindavani Sarang

  • स्वर गंधार व धैवत वर्ज्य। निषाद दोनों। शेष शुद्ध स्वर। जाति औढव - औढव। थाट काफी। वादी/संवादी रिषभ/पंचम। समय मध्यान्ह। विश्रांति स्थान सा; रे; प; नि; - सा’; प; रे; । मुख्य अंग रे म; प रे; म रे, नि सा; म प, नि१ प म रे, नि सा;

  • आरोह-अवरोह सा रे म प नि सा′ - सा′ नि१ प म रे सा; । विशेष - राग सारंग को राग बृंदावनी सारंग भी कहा जाता है। यह एक अत्यंत मधुर व लोकप्रिय राग है। इस राग में रे-प, म-नि, नि१-प, म-रे की स्वर संगतियाँ राग वाचक तथा चित्ताकर्षक हैं। इस राग के पूर्वार्ध में प रे म रे

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Malkauns

  • स्वर रिषभ व पंचम वर्ज्य। गंधार, धैवत व निषाद कोमल। शेष शुद्ध स्वर। जाति औढव - औढव

  • थाट भैरवी। वादी/संवादी मध्यम/षड्ज। समय रात्रि का तीसरा प्रहर। विश्रांति स्थान सा ग१ म - म ग१ सा। मुख्य अंग, ध१, नि१ सा ग१ म; ग१ म नि१ ध१ म; ध१ नि१ सा’; ग१’ सा’ नि१ ध१; । आरोह-अवरोह सा ग१ म ध१ नि१ सा’ - सा′ नि१ ध१ म ग१ सा; । विशेष - राग मालकौन्स रात्रि के रागों में बहुत ही लोकप्रिय राग है। इस राग के युगल स्वरों में परस्पर संवाद अधिक होने से इसमें मधुरता टपकती है। इस राग का चलन विशेषतया मध्यम पर केंद्

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