CBSE-NET (Based on NTA-UGC) Hindustani Music (Paper-II) Applied Theory-Detailed and Critical Study of Ragas Revision (Page 14 of 52)

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Kaafi

  • स्वर गंधार व निषाद कोमल। शेष शुद्ध स्वर। जाति सम्पूर्ण - सम्पूर्ण । थाट काफी। वादी/संवादी पंचम/षड्ज। समय रात्री का द्वितीय प्रहर। विश्रांति स्थान सा प - सा′ प रे। मुख्य अंग ग१ रे; म प; म प ध प; ध नि१ सा′; नि१ ध प; । आरोह-अवरोह सा रे ग१ म प ध नि१ सा′ - सा′ नि१ ध प म ग१ रे सा;

  • विशेष - राग काफी रात्रि के समय की भैरवी है। इस राग में पंचम बहुत खुला हुआ लगता है। राग को सजाने में कभी कभी आरोह में गंधार को वर्ज्य करते हैं जैसे - रे म प ध नि१ ध प म प ग१ रे। इस राग कि सुंदरता को बढाने के ल

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Puriya

  • स्वर पंचम वर्ज्य। मध्यम तीव्र, रिषभ कोमल। शेष शुद्ध स्वर। जाति षाढव - षाढव। थाट मारवा। वादी/संवादी गंधार/निषाद। समय रात्री का दूसरा प्रहर। विश्रांति स्थान ग म् नि - नि म् ग। मुख्य अंग ग म् ध ग म् ग; नि म् ग; ग म् ग रे१ सा; , नि रे१ ग; । आरोह-अवरोह, नि रे१ ग म् ध नि सा′ - सा′ नि ध म्; ग म् ध; ग म् ग रे१ सा; । विशेष - राग पूरिया रात्रि के रागों में अनूठा प्रभाव पैदा करता है। यह पूर्वांग प्रधान राग है। इस राग का विस्तार मन्द्र और मध्य सप्तक में किया जाता है। इसी कारण यह राग सोहनी से अ

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