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तृतीय कोटि के (रीतिमुक्त) के वर्ग

रीति मुक्त धारा के अतरिक्त इन कवियों में भी रचना की दृष्टि से कई उपवर्ग किए जा सकते हैं। 1 प्रबंधकार 2 नीतिकार 3 भक्तिकाव्यकार 4 सूक्तिकार 5 ज्ञानोपदेशक 6 वीरकाव्यकार।

प्रबंधकार-इस काल में अनेक प्रबंध लिखे गये, पर उनमें से कम में कवित्व का आकर्षण रहा। ये प्रबंध भी दो प्रकार के हैं- कथात्मक प्रबंध और वर्णनात्मक प्रबंध।

कथात्मक प्रबंधकार- ऐसे प्रबंधकारों में दोहे चौपाइयों में लिखे गये काव्य निम्न हैं-

  • (सं. 1718 में पूरा होने वाला) महाभारत के निर्माता सबलसिंह चौहान की ’विजय मुक्तावली’
  • कार श्री छत्रसिंह कायस्थ, ’चंडी चरित्र’ आदि रचनाओं के प्रणेता गुरु गोविंदसिंह… (190 more words) …

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रीतिकाल का रचनाकाल और नामकरण

  • रीतिकाल का रचनाकाल: -

    भक्ति-युग के बाद जिस साहित्य की रचना की गई साहित्य मनीषियों ने उसे रीतिकाल की संज्ञा दी है। इसका रचना काल सं. 1700 से 1900 तक माना गया हैं। यह मुगलशासन का युग था जो अपनी समृद्धि और वैभव के लिए विख्यात है। शासक भोग-विलास में लिप्त थे। तत्कालीन काव्य में श्रृंगार और विलासिता की प्रधानता हो गई। कवियों ने अपने आश्रदाताओं को प्रसन्न करना अपने काव्य का लक्ष्य समझा। यही बात है कि इनकी रचना में मौलिकता का अभाव पाया जाता है। साथ ही अपने आश्रयदाता की मिथ्या प्रशंसा का दोष मिलता है। श्रृंगार मिश्रत… (290 more words) …

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