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रीतिकाल के दव्तीय कोटि के (रीतिसिद्ध) कवि

रीतिसिद्ध काव्य

रीतिकाल तक आते-आते हिन्दी काव्य-साहित्य विकसित -वर्धित ही नहीं विविधमुखी भी बन चुका था। प्रमाण है- इस युग में पाया जाने वाला विविध प्रकार का विपुल कृतित्व। दुर्भाग्य से, लंबे समय तक इस काल साहित्य-विवेचन या तो उपेक्षित रहा अथवा इतिहासकार-आलोचकों के एकांगी दृष्टिकोण का शिकार। यहाँ तक कि इतिहासकार-प्रवर आचार्य रामचंद्र शुक्ल तक को इसके उप-विभाजन करने का समुचित आधार नहीं मिल सका, जिसके फलस्वरूप आधे दर्जन… (1169 more words) …

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रीतिकाल के दव्तीय कोटि के (रीतिसिद्ध) कवि रामसहायदास, पेजनस, मानसिंह

  • रामसहायदास -’बिहार- सतसई’ के अनुकरण पर ही रची गई इसी युग की एक प्रमुख सतसई काव्य-कृत्ति है- ’राम सतसई’ जिसका ’श्रृंगार सतसई’ के नाम से काशी से प्रकाशन भी हो चुका है। रचनाकार हैं रामसहायदास जो प्राय: ’भगतजी’ भी कहे गयो हैं। ये चौबेपुर (बनारस) निवासी अस्थान कायस्थ थे।

  • पन्ना निवासी पेजेनस -कवि का कोई ग्रंथ उपलब्ध नहीं है, यद्यपि शिवसिंह सरोज में इनकी दो रचनाओं-’नखशिख’ तथा ’मधु प्रिया’ की… (79 more words) …

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