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रीतिकाल का संप्रदाय, काव्य, श्रृंगारकाल और अवधि

  • संप्रदाय: -इन रीतियों का समावेश ही काव्य को जीवित बनाता है। आगे चलकर ध्वनि संप्रदाय में ’ध्वनि’ को प्रतिष्ठा दी। अलंकार और वक्रोक्ति संप्रदाय अलंकार तथा उक्ति-वैचित्र्य को काव्य की आत्मा मानते हैं। रस संप्रदाय ’वाक्य रसात्मक काव्यम्‌’ कहकर रस को ही काव्य की आत्मा स्वीकार करता है।

  • काव्य कला काल: - शुक्लजी से मात्र 2 वर्ष बाद ही, पं. रामाशंकर ’रसाल’ ने इस काल को ’काव्य कला काल’ की संज्ञा प्रदान की और कहा, ”काव्य कला-काल से तात्पर्य उस काल से है, जिसमें हिंदी-क्षेत्र में काव्य को कलापूर्ण किया अर्थात्‌ उसमें काव्य के चमत्कृत रूप एवं चातुर्यपूर्ण गुणों… (693 more words) …

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संपूर्ण रीति साहित्य का विभाजन

  • संपूर्ण रीति साहित्य का विभाजन-उक्त उपकरणों पर तथाकथित विशेषताओं से समन्वित संपूर्ण रीति साहित्य का विभाजन आचार्यों ने रीतिबद्ध एंव रीतिमुक्त धारा के नाम से किया हे। रीतिबद्ध के भीतर ’रीतिसिद्ध’ नामक एक विशेष शाखा की भी कल्पना कर ली गई है। रीतिबद्ध के भी अवांतर भेद किए हैं- जैसे, लक्ष्यकार, लक्षणकार एवं लक्ष्य, लक्षण उभयकार। फिर लक्षणकारों में एक देशीय, अनेकदेशीय एवं सर्वदेशीय आदि भेद किये जा सकते हैं। रीतिमुक्त धारा में केवल दो उपभेद हैं-विशुद्ध प्रेम धारा तथा रहस्यवादी प्रेम धारा। स्वरूप इस प्रकार होगा।

Division of Ritikal literature

Division of Ritikal Literature

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  • रीतिबद्ध धारा

    इस धारा… (190 more words) …

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