CBSE-NET (Based on NTA-UGC) Hindi Literature (Paper-II) हिन्दी साहित्य का इतिहास (History of Hindi Literature)-रीतिकाल (Ritikal) Revision (Page 5 of 23)

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रीतिकाल के प्रवर्तक आचार्य केशवदास

केशवदास (रीतिकाल के प्रवर्तक)

  • रीतिकालीन कवियों में आचार्य कैशवदास को प्रमुख स्थान दिया जाता है। उन्होंने काव्य के लक्षण ग्रंथों की रचना की जिसके माध्यम से व्याकरण जैसे रस छंद आदि का वर्णन किया गया है।

केशव के विषय में मतभेद-

  • रीति ग्रंथों का प्रवर्तक किसको माना जाए? इस संबंध में विदव्ानों ने पर्याप्त मतभेद हैं। कुछ विदव्ान केशव को रीतिकाल का प्रवर्तक मानते है तथा कुछ ने चिंतामणि त्रिपाठी को रीतिग्रंथों का प्रर्वतक माना है। डॉ. श्यामसुन्दरदास ने केशवदास की रीति ग्रंथों की परंपरा का आच

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रीतिकाल के प्रथम कोटि (रीतिबद्ध) के आचार्य जसवंतसिह

बेनी बंदीजन: -असनी के बंदीजन बेनी सं. 1700 के लगभग वर्तमान में थे। इनका कोई प्रसिद्ध ग्रंथ नहीं है। हाँ कुछ फुटकर रचनाएँ अवश्य हैं। बुंंदेलखंड कविवर मंडन की 5 पुस्तकों का पता खोज से लग पाया है- रस रत्नावली, रस विलास, जनक पचीसी, जानकी जूको ब्याह और नैन पचास।

मतिराम

जीवन परिचय-रीतिबद्ध कवियों में इनका महत्वपूर्ण स्थान है। ये आदि आचार्य चिंतामणि के भाई थे। जन्मकाल सं. 1764 के आसपास है। बूँदीराज महाराज भावसिंह के आश्रम में रहकर फिर महाराज शंभुनाथ सोलकी के आश्रय में रहे थे। इन्होंने ’ललित

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