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रीतिकाव्य में लोकजीवन

रीतिकाव्य में लोकजीवन

रीतिकाल राजाओं-सामंतों के वैभव-विलास का युग था। स्पष्टत: उनका वर्णन काव्य में प्रमुख होना ही था। परन्तु लोकजीवन से विमुख नहीं था क्योंकि कवि जीवन-जगत का गहन अनुभव रखने वाले थे। उन्होंने समाज के विस्तृत फलक का चित्रण किया है जैसे -चोर-शाह, शूर-कायर, मूर्ख-पंडित, नगर के रहने वाले -गाँव के रहने वाले, विभिन्न काम-धंधे करने वाले। विशेषत: बिहारी में तो नागरा समाज बखूबी उभरकर सामने आया है। कवियों ने पर्वो, त्यौहारों का वर्णन करके जन उल्लास को चित्रित किया है। रीतिकाल के लोक जीवन की प्रमुख वृत्तियां निम्न हैं-

  • रीतिकाल के कवियों ने बहुत से लोक-विश्वासों का… (86 more words) …

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रीतिकाल में आरोप, काव्यशास्त्र व उनकी कोटियाँ

कुछ आरोप और समाधान

  • रीतिकाव्य पर कुछ आरोप अथवा दोष सामान्यत: लगाये गये हैं तथा संस्कृत काव्य शास्त्र का अंधनुकरण, अस्पष्ट विवेचन, अश्लीलतापूर्ण श्रृंगार की प्रधानता, नायिका-भेद की प्रमुखता, रूढ़िवादिता, आश्रयदाता की अंध प्रशंसा या स्तुति, नारी या असंगत चित्रण तथा कला के प्रति अतिशय रुझान आदि। नि: संदेह इनमें से अधिकांश आरोप एकदम सच्चे भी हैं। फिर भी, यदि ध्यान से देखें तो अधिकांश दोष उस युग की ही देन है, कवि-आचार्यों की मजबूरी के साक्षी हैं। दूसरे कुछ आरोप भी प्राय: अतिशयोक्तिपरक है अथवा अश्लीलता, नारी-चित्रण और कलाप्रियता का। तटस्थ भाव से देखें तो इस काव्य में कुछ… (342 more words) …

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