CBSE-NET (Based on NTA-UGC) Hindi Literature (Paper-II) हिन्दी साहित्य का इतिहास (History of Hindi Literature)-रीतिकाल (Ritikal) Revision (Page 20 of 23)

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रीतिसिद्ध कवि बिहारी के अनुसार धारा

रीतिबद्ध व रीति -मुक्त धारा (स्वच्छन्तावादी धारा)

रीतिबद्ध धारावालों को साध्य एवं साधन दोनों काव्य ही था, पर रीतिमुक्त धारा वालों का साध्य था-प्रेम और उसी की अभिव्यक्ति का साधन था-काव्य। दोनों धाराआंे के अंतर निम्न हैं-

  • प्रथम धारा का लक्ष्य ’कला’ था, उसकी उपासना में यदि ’भाव’ की हत्या भी हो जाए तो इस बात की उन्हें चिंता न होने पर दव्तीय धारा का साध्य ’भाव’ था और कला इसकी अनुगामिनी थी।
  • प्रथम की सुंदरता ’शोभा’ पर से कही जा सकती हैं तो दव्तीय की ’सुषमा’ (परम-शोभा) पद से निवेदित की जा स

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रीतिकाल के दव्तीय कोटि के (रीतिसिद्ध) कवि सोलंकी, नेवाज, हितहरिवंश

  • राजा शंभुनाथ सिंह सोलंकी- ’नृपशंभु’ सितारगढ़ के नरेश थे, जिनको ’कविकोविदों के कल्पवृक्ष, तक बताया गया है। इनकी भी कवित्त-सैवयों में रचित कुछ पदमात्मक रचनाएँ ही मिलती हैं।

  • नेवाज- हिन्दी काव्य-जगत में यूँ तो नेवाज नामक जीन कवियों के उल्लेख मिलते हैं, जिनमें से एक थे -अंतर्वेद-निवासी ब्राह्यण कवि नेवाज जो पन्ना-नरेश छत्रसाल के आरित-दरबारी कवि थे। इनकी भी मात्र फुटकर रचनाएँ ही मिलती हें।

  • श्री हितहरिवंश: -सतसई की तरह शतक-परंपरा की, इस युग की एक पमुख रचना है-’राधासुधा शतक’ जिसमें 103 क

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