CBSE-NET (Based on NTA-UGC) Hindi Literature (Paper-II) हिन्दी साहित्य का इतिहास (History of Hindi Literature)-रीतिकाल (Ritikal) Revision (Page 2 of 23)

Subscribe now to access pointwise, categorized & easy to understand notes on 483 key topics of CBSE-NET (Based on NTA-UGC) Hindi Literature (Paper-II) covering entire 2018 syllabus. All the updates for one year are also included. View Features or choose a topic to view more samples.

Rs. 450.00 or

रीतिकाल का संप्रदाय, काव्य, श्रृंगारकाल और अवधि

  • संप्रदाय: -इन रीतियों का समावेश ही काव्य को जीवित बनाता है। आगे चलकर ध्वनि संप्रदाय में ’ध्वनि’ को प्रतिष्ठा दी। अलंकार और वक्रोक्ति संप्रदाय अलंकार तथा उक्ति-वैचित्र्य को काव्य की आत्मा मानते हैं। रस संप्रदाय ’वाक्य रसात्मक काव्यम्‌’ कहकर रस को ही काव्य की आत्मा स्वीकार करता है।

  • काव्य कला काल: - शुक्लजी से मात्र 2 वर्ष बाद ही, पं. रामाशंकर ’रसाल’ ने इस काल को ’काव्य कला काल’ की संज्ञा प्रदान की और कहा, “काव्य कला-काल से तात्पर्य उस काल से है, जिसमें हिंदी-क्षेत्र में काव्य को कला

… (4571 more words) …

Subscribe & login to view complete study material.

केवल रीतिकालीन (काव्य) साहित्य का विभाजन व विभिन्न परिस्थितियाँ

आचार्य रामचंद्र शुक्ल रीतिकाल साहित्य का सर्वप्रथम सशक्त विभाजन किया था। जिन्होंने मुख्यत: इसको वर्ण्य विषय के आधार पर दो वर्गों में रखा- रीतिबद्ध और रीतिमुक्त। रीतिमुक्त कवियों (या काव्य) को उन्होंने सात उप-वर्गों में रखा था। प्रमुख विभाजन तो आजकल भी ज्यों या त्यों स्वीकार किया जाता है, किन्तु उप-विभाजन पर आज आपत्ति ही नहीं उठाई जाती, नये-नये नामों से पुनर्विभाजन भी किया जाता है। इसका श्रीगणेश भी डॉ. रसाल ने ही कर दिया था, जिन्होंने समस्त रीतियुगीन काव्य-कवियों को 11 वर्गों में रखा

… (8369 more words) …

Subscribe & login to view complete study material.

f Page
Sign In