CBSE-NET (Based on NTA-UGC) Hindi Literature (Paper-II) हिन्दी साहित्य का इतिहास (History of Hindi Literature)-रीतिकाल (Ritikal) Revision (Page 19 of 23)

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रीतिकाल के दव्तीय कोटि के (रीतिसिद्ध) कवि

रीतिसिद्ध काव्य

रीतिकाल तक आते-आते हिन्दी काव्य-साहित्य विकसित -वर्धित ही नहीं विविधमुखी भी बन चुका था। प्रमाण है- इस युग में पाया जाने वाला विविध प्रकार का विपुल कृतित्व। दुर्भाग्य से, लंबे समय तक इस काल साहित्य-विवेचन या तो उपेक्षित रहा अथवा इतिहासकार-आलोचकों के एकांगी दृष्टिकोण का शिकार। यहाँ तक कि इतिहासकार-प्रवर आचार्य रामचंद्र शुक्ल तक को इसके उप-विभाजन करने का समुचित आधार नहीं मिल सका, जिसके फलस्वरूप आधे दर्जन उपविभाग करके भी वे स्वयं उससे संतुष्ट नहीं हो सकते थे।

ध्यान दें तो

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रीतिसिद्ध कवि बिहारी

कवि बिहार (रीतिसिद्ध या केवल लक्ष्यकार)

जीवन परिचय-बिहारी माथुर चौबे कहे जाते हैं। इनका जन्म सं. 1660 में वसुबा, गोविंदपुरम्‌ गाँव में, जो ग्वालियर के पास है, हुआ था। इस प्रकार इनका जन्म ग्वालियर में, बाल्यकाल बुदेलों में और तारुण्य अपनी सुसराल मथुरा में बीता था। इनके पिता का नाम कैशव था। गुलाबी नगरी के नाम से प्रसिद्ध नगर जयपुर के वियात नरेश मिर्जा राजा जयसिंह के राजकवि बिहारी लाल रीतिकाल के अग्रगण्य कवियों में हैं। अनुमानत: बिहारी कवि सं. 1720 तक वर्तमान में थे। बिहारी के अनुसार आ

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