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रीतिबद्ध के आचार्य पद्माकर भट्ट

पद्माकर भट्ट

  • जीवचन परिचय-ये मोहनलाल भट्ट के सुपुत्र थे और बांदा में सं. 1810 में जन्में थे। इनका मृत्युकाल संंवत्‌ 1890 है। अपने पिता की भाँति ये भी कई स्थान पर रहे और कई राजाओं का आश्रय प्राप्त किया। अपनी विशेषता के कारण ये सर्वत्र प्रिय रहे। जाति के ये तैलग ब्राह्यण थे। कवि तो थे ही साथ ही उच्चकोटि के पंडित भी थे। पिता के संस्कार पुत्र में भी आ गए।
  • रचनाएँ-पद्माकरजी के लिखे हुए कुल 9 ग्रंथ बताये जाते हैं- जिसमें 8 ग्रंथ उपलब्ध हैं।
  1. हिम्मत बहादुर विरुदावली
  2. जगद्धिनोद
  3. पद्माभरण
  4. जयहिसंह विरुदावली
  5. आलीजाह प्रकाश
  6. हितोपदेश
  7. राम… (341 more words) …

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रीतिकालीन साहित्य का आकलन

भक्त्कािलीन-हिन्दी का भक्तिकालीन साहित्य ऐसा साहित्य था जिस पर किसी देशवासी को गर्व हो सकता है। भक्त कवियों के काव्य में भक्तिरस में श्रृंगार का शिष्ट और मर्यादित समावेश हुआ। उनका श्रृंगार भक्ति की प्रगाढ़ता का साधन मात्र था किन्तु रीतिकालीनों कवियों ने उसे साध्य मान लिया। परिणामस्वरूप भक्ति के अमृत में श्रृंगार की मदिरा का मिश्रण हुआ। श्रृंगार की अमर्यादित प्रयोग से भक्ति की गंगा प्रदूषित हो गई। भक्ति काव्य की रचना ’स्वात: सुखाय’ के उद्देश्य की जाती है। रीतिकाल में भक्तिकालीन कविता की निष्ठा लुप्त हो गई। वह राजदरबार के मन बहलाने का साध न बन गई।… (519 more words) …

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