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रीतिकाल के दव्तीय कोटि के (रीतिसिद्ध) कवि सोलंकी, नेवाज, हितहरिवंश

  • राजा शंभुनाथ सिंह सोलंकी- ’नृपशंभु’ सितारगढ़ के नरेश थे, जिनको ’कविकोविदों के कल्पवृक्ष, तक बताया गया है। इनकी भी कवित्त-सैवयों में रचित कुछ पदमात्मक रचनाएँ ही मिलती हैं।

  • नेवाज- हिन्दी काव्य-जगत में यूँ तो नेवाज नामक जीन कवियों के उल्लेख मिलते हैं, जिनमें से एक थे -अंतर्वेद-निवासी ब्राह्यण कवि नेवाज जो पन्ना-नरेश छत्रसाल के आरित-दरबारी कवि थे। इनकी भी मात्र फुटकर रचनाएँ ही मिलती हें।

  • श्री हितहरिवंश: -सतसई की तरह शतक-परंपरा की, इस युग की एक पमुख रचना है-’राधासुधा शतक’ जिसमें 103 कवित्त-सवैये हैं। रचियता है- श्री हितहरिवंश के 12वें श्री हठी जी निको चरखारी -निवासी… (49 more words) …

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दव्तीय कोटि के कवि (रीतिसिद्ध) प्रतापसाहि

प्रतापसाहि

  • जीवन परिचय-रीतिकाल के अंतर्गत कवि, रीतिकाल एवं टीकाकार के रूप में प्रतापसाहि का नाम विशेष रूप से स्मरणीय है। ये बुंदेलखंड-निवासी रतनेस बंदीजन के पुत्र थे तथा चरखारी-नरेश महाराज विक्रमसिंह के आश्रय में भी रहते थे। ठा. शिवसिंह सेंगर के अनुसार ये पन्ना के महाराज छत्रसाल के आश्रय में रहे थे। उनका रचना-काल 1823 और 1843 ई. के बीच माना जाता है।
  • रचनाएँ-इनके दव्ारा रचे हुए ये 8 ग्रंथ बताये जाते हैं- जयसिंहप्रकाश, श्रृंगारमंजरी, व्यंग्नार्थकौमुदी, श्रृंगारशिरोमणि, अलंकारचितामणि, काव्यविनोद, जुमलनखशिख और रसचन्द्रिका। इनके अतिरिक्त इन्होंने जसवंतसिंह के भाषाभूषण, मतिराम के रसराज, बलभद्र के नखशिख और बिहारी की सतसई… (327 more words) …

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