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रीतिकाल के प्रथम कोटि (रीतिबद्ध) के आचार्य प्रतापसिंह

प्रतापसिंह-इस धारा के अंतिम कवियों में प्रतापसिंह की उल्लेखनीय स्थिति है। इनका कविता काल (संवत्‌ 1880 से 1900) है। इनकी कई रचनाएँ हैं-

  • जयसिंह प्रकाश संवत्‌ 1851
  • श्रृंगार मंजरी (संवत्‌ 1889)
  • श्रृंगार शिरोमणि (संवत्‌ 1894)
  • अलंकार चिंतामणि (संवत्‌ 1894)
  • काव्य विनोद (संवत्‌ 1896)
  • रसराज की टीका (संवत्‌ 1896)
  • रत्नचंद्रिका (टीका-संवत्‌ 1896)
  • जुगल नख-शिख
  • बलभद्र नख-शिख की टीका।

यहाँ तक रीतिबद्ध धारा का इतिहास प्राय: समाप्त होता है। इसके बाद केवल शुद्ध लक्ष्यकार अथवा रीति सिद्ध कवि बिहारी का परिचय दिया जायेगा।

रीतिकाल के अन्य कवि में वृंद, गिरि

रीतिकाल के अन्य कवि

  • रीति युग के अंतर्गत कवियों का एक ऐसा वर्ग भी हुआ जिसने फुटकर रूप से काव्य रचना की। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने इन्हें ’कवि’ न कहकर सूक्तिकार कहा है। इस वर्ग में वृंद, बाबा दिनदयाल गिरि आदि का नाम प्रमुख है। उनका संक्षिप्त परिचय आगे दिया जाता है।

वृंद-’

  • जीवन परिचय-मेड़ता (जोधपुर) निवासी वृंद कृष्णगढ़ के राजा महाराज राजसिंह के गुरू थे। वृंदावनदास जो मृख्यत: वृंद कवि के नाम से प्रसिद्ध रहे। जोधपुर के मेड़ता नामक स्थान पर बसे। अवक या भोजक जाति के रूपजी पुत्र वृंद तत्कालीन नरेश जसवंतसिंह, नवाब मुहम्मद खाँ मुगल सम्राट… (401 more words) …

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