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भारतेन्दु की पत्रिका का विकास

  • हिन्दी -पत्रकारिता का विकास

    भारतेन्दु युग में प्रथम स्वतंत्रता -संग्राम (सन्‌ 1857) की असफलता और फलस्वरूप विदेशी सत्ता के बढ़ते हुए दमनचक्र की भंयकर परिस्थितयों में ही हिन्दी पत्रकारिता ने आंखे खोली थीं। इस पत्रिकाओं को बनाये रखना बहुत कठिन कार्य था, लेकिन इसके पत्रकार लोग इतने निर्भिक, निडर, साहसी और देशभक्त थे कि हर मूल्य पर कर्तव्य-पालन पर डटे रहना चाहते थे। बड़े-बड़े विरोधी को झेलकर अपने कर्तव्य यानी पत्रिका को बनाये रखता था। लेखक मंडल का उत्साहित प्रेरित करता था। नि: संदेह भारतेन्दु भी इसी एक श्रेणी के थे। 28 मार्च सन्‌ 1844 को प्रकाशित ’कविचनसुधा’ में विज्ञप्ति… (70 more words) …

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भारतेन्दु जी की उपलब्धियाँ

  • हिन्दी साहित्य को भारतेन्दु की उपलब्धियाँ

    नि: संदेह भारतेन्दु युग प्रवर्तक और युगांतकारी मजे कलाकार हैं तथा आधुनिक हिन्दी साहित्य में एक नयी एवं स्वस्थ्य चेतना केन्द्र बिन्दु के जन्मदाता हैं। हिन्दी खाड़ी बोली को परिष्कृम करने का श्रेय उन्हें ही हैं। कविता उनके ही दव्ारा नई चाल में ढली। सामान्य जन-जीवन और उसकी समस्याओं से उसका सीधा सम्पर्क हुआ । शिल्प के क्षेत्र में उन्होंने नए-नए प्रयोग किए। नाटकों के विकास में रंगमंच का निर्माण हुआ। निबंधों दव्ारा युगीन समस्याओं का चित्रण हुआ। इसलिए भारतेन्दु आधुनिक हिन्दी साहित्य के जन्मदाता माने जाते हैं। सब मिलाकर यह कहा जा सकता… (994 more words) …

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