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प्रमुख निर्गुण संत कवि

निर्गुण संतों की विचारधारा के बीज सिद्ध-नाथ कवियों की रचनाओं में तो मिलते ही हैं, आदिकाल में नामदेव ने भी इस दिशा में योगदान दिया था। भक्तिकालीन निर्गुण भक्त कवियों में कबीर, दादू, नानक, रैदास, सुन्दरदास, मलूकदास, प्रभृति संतों ने भक्ति-भावना के प्रसार और भक्ति-काव्य की रचना में न केवल स्वयं उल्लेखनीय योग दिया, अपितु इनकी शिष्य-परम्परा में बाद में भी निर्गुण भक्तिकाव्य की रचना होती रही है।

भक्ति आन्दोलन के उदय के सांस्कृतिक परिस्थियाँ व कारण

  • भक्ति साहित्य में भारतीय संस्कति एवं आचार-विचार पूर्ण रूप से सुरक्षित रहे है। भक्तिसाहित्य उच्चतम धर्म की व्याख्या करता है और उसमें उच्चकोटि के काव्य की रचना हुई इस काव्य की आत्मा भक्ति है। भारतीय संस्कृति की मुख्य विशेषताएँ है उसकी समन्वयातमकता की प्रवृत्ति। मूर्तिपूजा, तीर्थयात्रा, कर्मफल में विश्वास, अवतारवाद एवं गौ-ब्राह्यण की पूजा पौराणिक धर्म की विशेषताएँ है जिनका स्वर सगुण भक्ति साहित्य में कर्णगोचर हुआ है। मध्यकालीन धर्म साधना में पूर्ववर्ती सभी धर्म साधनाएँ बनी रहीं। शैव-शक्ति तथा भागवत धर्मों में ज्ञान और भक्ति की धाराएँ निरंतर प्रवाहमान रहीं। राम और शिव, भगवती दुर्गा और वैष्णवों में समन्वय… (1202 more words) …

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