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भक्ति आंदोलन का अखिल भारतीय स्वरूप और उसका: प्रादेशिक वैशिष्ट्‌य

  • भक्ति काव्य आंदोलन को एक ऐसी ऐतिहासिक घटना के रूप में जाना जाता है, जिसने प्रथम बार एक विराट आंदोलन को जन्म देते हुए जितना राष्ट्र के सांस्कृतिक परिदृश्य को उद्धेलित किया, उतना ही सामाजिक तथा राजनीतिक परिदृश्य को। इस आंदोलन को पुनर्जागरण आंदोलन के रूप में की पहचान मिली है। युगों से जिस सामन्तों संस्कृति ने अपनी जड़ें, गहरे जमाए हुए समूचे राष्ट्र को नाना प्रकार की मिश्रित संस्कृतियों और विचारधाराओं के बीच विछुब्ध कर दिया, उसे प्रथम बार भक्ति आंदोलन ही एक ऐसी चेतावनी प्रदान करता है, जिसकी छाप भारत में ही नहीं अपितु यूरोप के सामाजिक इतिहास… (1664 more words) …

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भक्तिकाव्य में लोकधर्म

  • विदव्ानों ने भक्ति काव्य की पहचान एक सशक्त क्रांतिकारी आंदोलन के रूप में की है, समान्यता 14वीं सदी के मध्य में 17 वीं सदी के मध्य तक के कालखंड को भक्तिकाल के नाम से जाना जाता है। यह संक्रांतिकाल था, जिसमें एक तरफ तो हिन्दू धर्म अपने तमात मत-मतान्तरों के बीच सहस्त्रों उदव्ेलनों के बीच विक्षुब्ध था। दूसरी तरफ आक्रांता इस्लाम भारतवर्ष में अपनी जड़ें जमा रहा था, परम्परागत सनातन धर्म के समक्ष एक चुनौती उपस्थित कर दिया था। जैसा कि डॉ. हजारी प्रसाद दव्वेदी कहते हैं कि प्रथम बार अनेक मत-मतान्तरों का विशाल समुदाय-सनातन धर्म अपने को गैर-इस्लामी संगठन… (2147 more words) …

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