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लोक पक्ष

हिन्दी साहित्य के प्रख्यात समीक्षक आचार्य शुक्ल साहित्य शुक्ल साहित्य की रचना भूमिका निरूपति करते हुए उसके लोक पक्ष पर विशेष ध्यान केन्द्रित करते हैं। लोक की सर्जनात्मक जमीन तक जुड़कर साहित्य उदात्त मूल्यों की प्रतिष्ठा कर सकता है। निर्गुण भक्तिधारा का साहित्यिक मूल्यांकन करते हुए आचार्य शुक्ल लिखते हैं-

प्रस्तत कालखंड के सभी कवि प्राय: अनपढ़ हैं, प्रस्तत कवियों ने भक्तिकाल के दो स्तर निम्न बताएं है-

  • एक स्तर पर तो अत्यंत महत्वपूर्ण बातें कहीं हैं, जिससे दलित वर्ग का आत्मविश्वास जगा है और नीवी समझी जाने वाली जातियों में नए विश्वास एवं उत्साह का संचार होता है।
  • लेकिन… (484 more words) …

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प्रमुख निर्गुण संत कवि – मलूकदास

मलूकदास (1574 - 1682) का आविर्भाव उस समय हुआ जब भारतवर्ष में अकबर के साम्राज्य का दीपक हिन्दुओं के स्निग्ध स्नेह से जगमगा रहा था। उनका महा प्रस्थान औरंगजेब के बाल्य-काल में हुआ। उनके पिता का नाम सुन्दरदास खत्री था। संसार से अलग का जो बीज मलूकदास के हृदय में आगे चलकर पल्लवित और पुष्पित हुआ, उसका बीजारोपण उनकी बाल्यावस्था में ही हो चुका था। उनके दीक्षा-गुरु के संबंध में हिन्दी के इतिहासकारों में बड़े मतभेद हैं कुछ उन्हें कील का शिष्य मानते हैं और कुछ द्राविड़ विट्‌ठल को उनका गुरु बताते हैं। किन्तु मलूकदास ने ’सुखसागर’ में गुरु देवनाथ… (383 more words) …

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