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भक्ति आंदोलन के उदय के परिस्थितियाँ व सामाजिक कारण

  • हिन्दु समाज जाति-पाँति की भावना से जीर्ण हो रहा था। हिन्दुओं में छुआछुत और ऊँच-नीच की भावना प्रबल थी। बाल विवाह और सती प्रथा आदि अनेक कुरीतियों का प्रचलन था। स्त्रियों में पर्दा प्रथा कठोरता से प्रचलित थी। उनका घर से निकलना वर्जित था। विधवा-विवाह निषेध था। मुसलमानों में जाति-पाँति और छुआछुत का रोग तो नहीं था परन्तु शिया और सुन्नी संप्रदायों के मतभेद गंभीर संघर्ष पैदा करते थे।
  • मुसलमान और हिन्दू दोनों जातियाँ अपने त्यौहार या पर्वो को समारोह और उत्साह के साथ मनाती थीं। अधिकांश मुसलमान बादशाह विधर्मी हिन्दुओं पर अत्याचार करते रहे। लेकिन कभी अकबर जैसे बादशाह… (454 more words) …

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प्रमुख निर्गुण संत कवि - हरिदास निरंजनी

  • संत हरिदास निरंजनी-संप्रदाय के कवि थे, जिसका मूल स्त्रोत नाथ-पंथ है। साधना-क्षेत्र में इस संप्रदाय को नाथ-पंथ एवं संत मत की मध्यवर्ती कड़ी कहा जा सकता है। यह एक प्राचीन धर्म-संप्रदाय है, जिसका प्रभाव उड़ीसा प्रान्त में किसी-न-किसी रूप में आज तक विद्यमान है। आचार्य क्षितिमोहन सेन ने अपने ग्रंथ ’मेडिवियल मिस्टिसिज्म’ में यह प्रतिपादित किया है कि सर्वप्रथम इस मत का प्रचार उड़ीसा से ही प्रारंभ हुआ था, तदनन्तर यह संप्रदाय अपने जनप्रिय और सच्चे आदर्शो के कारण पूर्व की ओर भी प्रसारित हुआ। इस संप्रदाय का इतिहास पूर्णरूपेण ज्ञात नहीं है। प्रचलित है कि इस संप्रदाय के प्रवर्तक… (369 more words) …

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