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प्रमुख निर्गुण संत कवि – नानकदेव

  • नानक-पंथ के प्रवर्तक गुरु नानकदेव (1469 - 1538) इतिहास-प्रसिद्ध व्यक्ति हैं। उनके दव्ारा संस्थापित सम्प्रदाय ने उन्हीं के जीवन-काल में एक व्यापक संगठन का रूप धारण कर लिया था। राजनीतिक परिस्थितियों के कारण उनका संप्रदाय और भी व्यापक, सुदृढ़ और सुव्यवस्थित होता गया। नानक-पंथ की स्थापना राजनीतिक परिस्थितियों के कारण हुई, किन्तु उसका स्वरूप धार्मिक तत्वों के रंग से अनुरंजित है। नानकदेव समन्वयशील और उदार प्रवृत्ति के व्यक्ति थे। उनमें अद्भूत संगठन-शक्ति, क्षमाशीलता और दूरदिर्शता विद्यमान थी।
  • उनका आविर्भाव लाहौर के निकटस्थ राईभाई की तलवण्डी ग्राम में हुआ था। उनके पिता का नाम कालूचन्द एवं माता का नाम तृप्ता था।… (358 more words) …

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वैष्णव भक्ति की सामाजिक -सांस्कृतिक पृष्ठीभूमि

  • भारत की प्राचीनतम वाङ्‌मय वेद और उपनिषदों में भक्ति के सूत्र मिलते है। महाभारत, गीता तथा पांचरात्र आदि ग्रंथों में विष्णु की अवतार भावना स्पष्ट की गई है। अमीरों के प्रभाव से भारत में बालकृष्ण की पूजा का चलन बढ़ा। वैष्णव भक्ति का मुख्य प्राण अंहिसा है। कर्म, ज्ञान और उपासना के समन्वय पर बल देते हुए इसमें गुरु को सर्वाधिक महत्व दिया गया है, गुरु को भगवान से भी ऊँचा स्थान दिया गया है।
  • वैष्णव भक्ति सगुण और निर्गुण दोनों ही रहे हैं। वैष्णव भक्ति दक्षिण में आलवार संतों के प्रभाव से फली-फूली जिसे रामानंद दक्षिण से उत्तर से… (150 more words) …

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