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प्रमुख निर्गुण संत कवि - दादूदयाल

  • दादू पंथ के प्रवर्तक संत दादूदयाल धर्म-सुधारक, समाज-सुधारक और रहस्यवादी कवि थे। मध्यकालीन साधकों में उनका व्यक्तित्व बड़ा प्रभावशाली है। उनका जन्म अहमदाबाद में हुआ था, किन्तु उनके आविर्भाव-काल के संबंध में मतभेद हैं डॉ. बड़थ्वाल, आचार्य रामचन्द्र शुक्ल और परशुराम चतुर्वेदी के अनुसार उनका जन्म 1544 ई. में हुआ था, जबकि डॉ. रामकुमार वर्मा के अनुसार वे 1601 ई. में अर्विभूत हुए थें दादू की जाति के संबंध में भी भेद हैं सुधाकर दव्वेदी के मत से वे धुनिया थे। क्षितिमोहन सेन ने अपने ग्रंथ ’दादू’ में उल्लेख किया है कि एक ब्राह्यण के पालित पुत्र थे, डॉ. बड़थ्याल… (270 more words) …

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निर्गुण काव्य

अवतारवाद को स्वीकार कर लेने के फलस्वरूप सगुण भक्ति को एक साकार आलम्बन मिला। जिसके कारण उसे सामान्य अशिक्षित व्यक्ति भी सहज ही स्वीकार कर सकता है। निर्गुण भक्ति का आलम्बन निराकार है, फलस्वरूप वह जनसाधारण के लिए ग्राहय नहीं हो सकती। सामाजिक उपयोगिता की दृष्टि से सगुण भक्ति निर्गुण भक्ति की अपेक्षा कहीं अधिक महत्वपूर्ण है, किन्तु इसी आधार पर निर्गुण भक्ति की सत्ता या महत्व के विषय में संदेह नहीं किया जाना चाहिए। यह सत्य हैं कि सगुण भक्ति पर आस्था रखने वाले साधकों ने निर्गुण भक्ति को लेकर तरह-तरह की शंकाएं उठायी है। उनका मूल तर्क यह… (1687 more words) …

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