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राग एवं रागानुमा, मधुर एवं प्रीति-भाव:

  • इन लोगों की भक्ति में विशिष्ट द्धैतवादियों की भक्ति का सा प्रेम एवं श्रद्धा दोनों का समबल योग नहीं हैं। यहाँ केवल ’प्रेम’ रूप ही भक्ति है, श्रद्धा गौण है। इस भक्ति को ’रागानुगा’ कहते हैं। निसर्गत: उद्रिक्त वृत्ति ही राग है। जीव गोस्वामी ने गोपियों की रति को ’मधुरारति’ कहा है और बताया है कि यह निसर्ग जात होती है-’रति: स्वाभावजैव स्यात्‌ प्राय: गोकुल सुभ्रवास्‌।’ राग के दो आलंबन हैं- 1 प्रपंच 2 भगवान्‌। प्रथम में विरति एवं भगवान्‌ में नैसर्गिक रति मुक्ति विधायनी हैं। रागानुगा के दो अंश है- राग और अनुग। रागात्मक भक्ति केवल ब्रजवासियों की हैं… (480 more words) …

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आधुनिक कालीन कृष्ण काव्य

  • आधुनिक कालीन के कम-से-कम भारतेंन्दु-युग के कृष्ण काव्य में मुख्यत: ’मध्यकालीन अवशेष’ ही मिलते हैं। भारतेन्दु हरश्चिंद्र और जगन्नाथ रत्नाकर (उद्धव शतक) का कृष्ण काव्य इसी का प्रमाण है।

  • कृष्ण काव्य की दीर्घ परंपरा में कृष्ण का आदर्श जन-नायक योगी रूप अपेक्षाकृत अत्यल्प मात्रा में रहा हैं। हिन्दी में उनके भोगी तथा अवतार नायक रूप को ही अंकित किया जाता रहा है। सर्वप्रथम द्धिवेदी युग में आकर कृष्ण को परंपरा से हटकर, एकदम नया रूप प्रदान किया गया। प्रदाता थे- अयोध्यासिंह उपाध्याय ’हरिऔध’ जिनके कारण सुधारकवाद, राष्ट्रवाद, आदर्शवाद एवं सबसे अधिक बौद्धिकता, तर्क-सम्मत और बुद्धि-सम्मत रूप में अंकित होने के… (43 more words) …

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