CBSE-NET (Based on NTA-UGC) Hindi Literature (Paper-II) हिन्दी साहित्य का इतिहास (History of Hindi Literature)-हिन्दी कृष्ण-काव्य (Hindi Krishna Poet) Revision (Page 3 of 14)

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कृष्ण भक्ति शाखा के भाग

  • सगुण धारा की दो शाखाएँ हैं। राम भक्ति शाखा एवं कृष्ण भक्ति शाखा। प्रथम शाखा के प्रतिनिधि कृतिकारों की चर्चा पूर्वाध्याय में की जा चुकी है, सम्प्रति इस कृष्ण भक्ति शाखा के साहित्यिक विकास का परिचय दिया जा रहा है। इस काल का यह धार्मिक साहित्य की दार्शनिक पीठिका पर सुस्थिर है। महाप्रभु के जिन सिद्धांतों का अनुगमन कर इस काल के कवियों ने साहित्य के भंडार का समृद्ध किया, उन सिद्धांतों की चर्चा पहले की जानी आवश्यक है।

  • शुद्धाद्धैत वादी दर्शन

    महाप्रभु का सिद्धांत शुद्धाद्धैत के नाम से विख्

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राग एवं रागानुमा, मधुर एवं प्रीति-भाव:

  • इन लोगों की भक्ति में विशिष्ट द्धैतवादियों की भक्ति का सा प्रेम एवं श्रद्धा दोनों का समबल योग नहीं हैं। यहाँ केवल ’प्रेम’ रूप ही भक्ति है, श्रद्धा गौण है। इस भक्ति को ’रागानुगा’ कहते हैं। निसर्गत: उद्रिक्त वृत्ति ही राग है। जीव गोस्वामी ने गोपियों की रति को ’मधुरारति’ कहा है और बताया है कि यह निसर्ग जात होती है-’रति: स्वाभावजैव स्यात्‌ प्राय: गोकुल सुभ्रवास्‌।’ राग के दो आलंबन हैं- 1 प्रपंच 2 भगवान्‌। प्रथम में विरति एवं भगवान्‌ में नैसर्गिक रति मुक्ति विधायनी हैं। रागानुगा के दो अ

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