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रीतिकालीन कृष्ण काव्य

  • रीतिकाल में कुछ फुटकर कृष्णभक्त अवश्य हुए अथवा उनके काव्य में कृष्ण भक्ति की प्रमुखता रही है। भक्तप्रवर नगरीदास, बख्शी हंसराज, हितवृन्दावन, भगवत रसिक हठीजी, ब्रजवासीदास आदि का कृष्ण काव्य इसी का उद्घोषक हैं। फिर भी इस काल में कृष्ण काव्य की आत्मा ही बदल गयी। मात्रा की दृष्टि से तो इस काल का अधिकांश काव्य कृष्ण परक है किंतु इसमें प्रधानता लौकिक श्रृंगार, यहाँ तक कि स्थूल श्रृंगार तक

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अन्य फुटकर कवि - नरोत्तमदास

  • नरोत्तमदास ने सुदामा चरित की रचना की। उनकी कविता सरस और हृदय ग्राहिणी है। इसके प्रत्येक पद में कवि की भावुकता और सहृदयता झलकती है। दीनों के प्रति कृष्ण के बन्धुभाव और वात्सल्यता का स्वाभाविक चित्र निम्नलिखित पद में दर्शनीय हैं-

    ”ऐसे विहाल बिवाइन सों भए,

    कंटक-जाल गड़े पुनि जोए।

    हाय महादुख पाए सखा!

    तुम आए इते न, किते दिन खोए।।

    देखि सुदामा की दीन दसा

    करुना करिकै करुनानिधि रोए।

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