CBSE-NET (Based on NTA-UGC) Hindi Literature (Paper-II) हिन्दी साहित्य का इतिहास (History of Hindi Literature)-हिन्दी कृष्ण-काव्य (Hindi Krishna Poet) Revision (Page 2 of 14)

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रीतिकालीन कृष्ण काव्य

  • रीतिकाल में कुछ फुटकर कृष्णभक्त अवश्य हुए अथवा उनके काव्य में कृष्ण भक्ति की प्रमुखता रही है। भक्तप्रवर नगरीदास, बख्शी हंसराज, हितवृन्दावन, भगवत रसिक हठीजी, ब्रजवासीदास आदि का कृष्ण काव्य इसी का उद्घोषक हैं। फिर भी इस काल में कृष्ण काव्य की आत्मा ही बदल गयी। मात्रा की दृष्टि से तो इस काल का अधिकांश काव्य कृष्ण परक है किंतु इसमें प्रधानता लौकिक श्रृंगार, यहाँ तक कि स्थूल श्रृंगार तक की है। आचार्य भिखारी दास की निम्नलिखित पंक्ति सच में तो इस युग में प्राय: सभी कृष्ण काव्यकारों पर चरित

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आधुनिक कालीन कृष्ण काव्य

  • आधुनिक कालीन के कम-से-कम भारतेंन्दु-युग के कृष्ण काव्य में मुख्यत: ’मध्यकालीन अवशेष’ ही मिलते हैं। भारतेन्दु हरश्चिंद्र और जगन्नाथ रत्नाकर (उद्धव शतक) का कृष्ण काव्य इसी का प्रमाण है।

  • कृष्ण काव्य की दीर्घ परंपरा में कृष्ण का आदर्श जन-नायक योगी रूप अपेक्षाकृत अत्यल्प मात्रा में रहा हैं। हिन्दी में उनके भोगी तथा अवतार नायक रूप को ही अंकित किया जाता रहा है। सर्वप्रथम द्धिवेदी युग में आकर कृष्ण को परंपरा से हटकर, एकदम नया रूप प्रदान किया गया। प्रदाता थे- अयोध्यासिंह उपाध्याय ’हरिऔध’ ज

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