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प्रयोगवाद युग का आरंभ

प्रयोवाद काव्यधारा का आरंभ- इसका जन्म परंपरा और प्रगतिवाद के विरूद्ध प्रतिक्रिया के रूप में हुआ। प्रयोगवादी कवि स्वयं को ’राहो’ के अन्वेषी’ मानते हैं। इस काव्यधारा में प्रतीकों का अधिकाधिक महत्व है। इसके प्रवर्तक अज्ञेय हैं। प्रयोगवाद के संबंध में विचार निम्न हैं-

  • प्रयोगवाद प्रगतिवाद की अगली कड़ी नहीं था वास्तव में ये दोनों ही छायावाद की प्रतिक्रिया स्वरूप उठे आंदोलन थे जो कि छायावाद की वैयक्तिकता तथा अंर्तमुखी होने के कारण पनपे थे।
  • छायावद के अतिशय कल्पनामोह से विद्रोह होने के कारण प्रयोगवादी कवियों का अधिक बल यथार्थवाद पर रहा है। ये दर्शन के क्षेत्र में अस्तिवाद… (121 more words) …

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छायावाद के कवि - महादेवी वर्मा

महादेवी वर्मा-’हिन्दी काव्य की आधुनिक मीरा’ महादेवी वर्मा की कविता में वेदना की तीव्र अनुभूति पाई जाती है। उनकी कविता में प्रेम की आकुलता विद्यमान है। छायावादी और रहस्यवादी कवियों में उन्हें महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त है। इनका काव्य संगीत, चित्र कला और काव्य कला का अद्भुत संगम है। इनके प्रकृति-वर्णन में सजीवता है। पीड़ा महादेवी के मन की संगिनी है। वे पीड़ा में प्रियतम को खोजती हैं। आत्म परिचय देते हुए महादेवी जी स्वयं को दुख की बदली कहती हैं:

मैं नीर भरी दु: ख की बदली

विस्तृत जग का कोई कोना

मेरा न कभी अपना होना।

परिचय… (268 more words) …

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