CBSE-NET (Based on NTA-UGC) Hindi Literature (Paper-II) हिन्दी साहित्य का इतिहास (History of Hindi Literature)-छायावाद और उसके बाद (Chhayavaad and Later) Revision (Page 7 of 11)

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प्रगतिशील काव्य का वर्णन, प्रगतिवाद के विचार और मूल्यांकन

  • प्रगतिशील काव्य-आधुनिक हिन्दी काव्यधारा का एक नया मोड़ प्रगतिवाद के नाम से जाना जाता हैं। राजनीतिक क्षेत्र की साम्यवादी (मार्क्सवादी) विचारधारा काव्यक्षेत्र में प्रगतिवाद के नाम से अभिहित हुई। यह विचारधारा छायावाद की प्रतिक्रिया के रूप में विकसित हुई। प्रगतिवाद मार्क्स के विचारों से प्रभावित काव्यधारा है। प्रगतिशील और प्रगतिवादी साहित्य को आपस में सजृनात्मक मानना उचित नहीं होगा।

    प्रगतिशील साहित्य साम्यवादी विचारधारा से सर्वथा स्वतंत्र है जबकि प्रगतिवादी साहित्य मार्क्सवादी विचारधारा

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प्रयोगवाद युग का आरंभ

प्रयोवाद काव्यधारा का आरंभ- इसका जन्म परंपरा और प्रगतिवाद के विरूद्ध प्रतिक्रिया के रूप में हुआ। प्रयोगवादी कवि स्वयं को ’राहो’ के अन्वेषी’ मानते हैं। इस काव्यधारा में प्रतीकों का अधिकाधिक महत्व है। इसके प्रवर्तक अज्ञेय हैं। प्रयोगवाद के संबंध में विचार निम्न हैं-

  • प्रयोगवाद प्रगतिवाद की अगली कड़ी नहीं था वास्तव में ये दोनों ही छायावाद की प्रतिक्रिया स्वरूप उठे आंदोलन थे जो कि छायावाद की वैयक्तिकता तथा अंर्तमुखी होने के कारण पनपे थे।
  • छायावद के अतिशय कल्पनामोह से विद्रोह होने के कारण प्

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