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नई कविता का आरंभ, विचार, कवि व नामकरण

  • नई कविता

    दूसरा सप्तक के प्रकाशन (1951) से नई कविता का आरंभ माना जाता है। इसके कवि वहीं हैं। जो प्रयोगवाद के थे। प्रवर्तक भी अज्ञेय तथा मुक्तिबोध है। इस आंदोलन को आगे बढ़ाने में डॉ. रामस्वरूप एवं लश्मीकांत वर्मा दव्ारा संपादित नये पत्ते के प्रकाशन के साथ ’नयी कविता’ पत्रिका (1954) का प्रकाशन का श्रीगणेश हुआ। इसके संपादक-विजयदेव नारायण साही) इसके साथ ही नई प्रवृत्तिवाली कविताओं के लिए नई कविता शब्द प्रयुक्त होने लगा। तथा ’निकष’ पत्रिका (1955 ई. संपादक-धर्मवीर भारती तथा लक्ष्मीकांत वर्मा) का महत्वपूर्ण हाथ है। 1960 ई. में प्रयोगवाद के स्थान पर नई कविता प्रतिष्ठित हो… (259 more words) …

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प्रयोगवाद युग की प्रमुख प्रवृत्तियाँ

प्रगतिवादी कविता की मुख्य प्रवृत्तियाँ

  • रूढ़ि का विरोध- प्रगतिवादी कवि ने मिथ्या परंपराओं, प्राचीन रूढ़ियों और अंध विश्वासों का डटकर विरोध किया है। भगवान में उनकी आस्था नहीं हैं अर्थात्‌ वह नास्तिक हैं।
  • शोषण के प्रति रोष- शोषितों की दयनीय दशा का चित्रण-इस बारे में अंचल जी कहते हैं-ं

यह नस्ल जिसे कहते मानव, कीड़ों से आज गई बीती।

  • बुझ जाती तो आश्चर्य न था, हैरत है पर कैसे जीती।।
  • क्रांति की भावना हैं।
  • सामाजिक जीवन का यथार्थचित्रण किया गया हैं
  • मानवतावाद- कवि संसार के पीड़ित लोगों से सहानुभूति रखता है। उसकी दृष्टि से सभी मनुष्य समान हैं। इस विषय… (201 more words) …

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