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छायावाद के कवि - डॉ. रामकुमार वर्मा

डॉ. रामकुमार वर्मा -अन्य छायावादी कवियों में डॉ. रामकुमार वर्मा का नाम प्रमुख रूप से लिया जाता हैं। इन्हें विशुद्ध छायावादी कवि माना जाता है। उनके रहस्यवाद पर कबीर का अधिक प्रभाव है। प्रकृति की सुकुमारता और सजीलापन कवि के मन को मुग्ध कर देते हैंं।

तुम सजीली हो सजाती हो सुहासिनी ये लताएँ।

क्यों न कोकिलकंठ मधुऋतु में तुम्हारें गीत गाएँ।।

वर्मा जी के गीत काव्य में गहरी मार्मिकता है। उनके काव्य में सुख में दुख, आशा में निराशा और जीवन में मृत्यु के दर्शन होते हैं। निराशावाद की भावना उनकी निम्नलिखित पंक्तियों में झलकती हैं।

क्या शरीर है?… (132 more words) …

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प्रयोगवाद में पपद्यवाद

  • सन्‌ 1952 में बिहार के तीन कवियों नलिन विलोचन शर्मा, केसरी कुमार तथा नरेश ने प्रयोगवाद की विशिष्टता पर बल देकर इसे ’पपद्यवाद’ नाम दिया उनके नामों के प्रथम अक्षर के आधार पर इसे ’नकेनवाद’ भी कहा जाता हैं।

  • पपद्यवाद में बल ’शब्द’ पर है ’अनुभूति’ पर नहीं। इसलिये कवि पुराने शब्दों को नया अर्थ देने के साथ-साथ नए शब्दों का निर्माण भी कर रहा है। यह साधारणीकरण में विश्वास नहीं करता बल्कि ’विशिष्टीकरण’ को काम्य मानता है।

  • पपद्यवाद प्रयोगवाद से अनेक स्तरों पर भिन्न है। इसका उदय भी तब हुआ जब प्रयोगवाद नई कविता में व्यस्थ हो रहा था।

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