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प्रगतिशील काव्य का वर्णन, प्रगतिवाद के विचार और मूल्यांकन

  • प्रगतिशील काव्य-आधुनिक हिन्दी काव्यधारा का एक नया मोड़ प्रगतिवाद के नाम से जाना जाता हैं। राजनीतिक क्षेत्र की साम्यवादी (मार्क्सवादी) विचारधारा काव्यक्षेत्र में प्रगतिवाद के नाम से अभिहित हुई। यह विचारधारा छायावाद की प्रतिक्रिया के रूप में विकसित हुई। प्रगतिवाद मार्क्स के विचारों से प्रभावित काव्यधारा है। प्रगतिशील और प्रगतिवादी साहित्य को आपस में सजृनात्मक मानना उचित नहीं होगा।

    प्रगतिशील साहित्य साम्यवादी विचारधारा से सर्वथा स्वतंत्र है जबकि प्रगतिवादी साहित्य मार्क्सवादी विचारधारा से जुड़ा हुआ है। उसकी रचना मार्क्सवादी से प्रभावित होकर की गई है।

    हिन्दी 1936 ई. के आसपास प्रगतिवाद का आगमन हुआ। 1936ई में लखनऊ में प्रगतिशील… (437 more words) …

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समकालीन में पत्रकारिताएँ

समकालीन साहित्यिक पत्रकारिता

हिन्दी की सर्वप्रथम पत्रिका उर्दंड मार्तंण्ड के प्रकाशन युगल किशोर के संपादन में ’कोल्हू टोला’ के अमड़ाताला की गलि के 37 अंक की हवेली (कलकत्ता) से हुआ।

स्वातन्त्र्योत्तर काल में

प्रकाशन की होड़ और बढ़ती-बदलती प्रतिदव्न्िदव्ता एवं वर्ग-गुट-विकास आदि कई कारण भी नई-नई पत्र-पत्रिकाओं के जन्म के कारण बने।

इस युग की प्रमुख पत्र-पत्रिकायें हैं-

  • धार्मिक-दार्शनिक- जनवाणी, जैनमित्र, कल्याण, कल्पवृक्ष, गीताधर्म, कबीर-संदेश, आर्य जगत और दयानन्द संदेश।
  • शोध गवेष्णा-शोध पत्रिका, ज्ञानपीठ पत्रिका, हिन्दुस्तानी, भारतीय विद्या, नागरी प्रचारिणी पत्रिका तथा ने. वि. हिन्दी शोध पत्रिका आदि।
  • साहित्यिक शैक्षणिक-नया समाज नया संदेश, साहित्य संदेश, आलोचना, कल्पना, माया,… (466 more words) …

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