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छायावाद के कवि - सूर्यकांत त्रिपाठी ’निराला’

सूर्यकांत त्रिपाठी ’निराला’-उनकी कविता में बुद्धि और हृदय का समन्वित रूप मिलता है। निराला जी दार्शनिक रहस्वादी थे। जागरण, मै और तुम आदि कविताओं में उनकी दार्शनिक भावना स्पष्ट झलकती है। निराला पर ब्रह्यवाद का प्रभाव था किन्तु ब्रह्य में लीन होकर अपने व्यक्तित्व को मिटा देना उन्हें स्वीकार नहीं था। निराला के अनुसार ईश्वर और जीव का संबंध चंद्र-चकोर की तरह हैं। ये बहुमुखी प्रतिभावान्‌ साहित्यकार थे। उन्होंने काव्य, नाटक, उपन्यास, कहानी, निबंध आदि सभी क्षेत्रों में समान गति से लेखनी चलाई। पीड़ितो के प्रति उनके मन में गहन सहानुभूति थी। विधवा के चित्रण में उनका करुणापूर्ण शब्द… (230 more words) …

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प्रयोगवाद का आरंभ व पत्रिका

  • प्रयोगवाद का जन्म-प्रथम और दव्तीय विश्वयुद्ध के भयंकार नरसंहार ने यूरोप के युवा साहित्यकारों के मन को झगझोढ़ कर रख दिया। उन्होंने साहित्य में नए प्रयोग किए। उस प्रकार प्रयोगवाद का जन्म हुआ। भारत भी इस प्रभाव से अछूता न रहा। 1943 में दव्तीय महायुद्ध के अंतिम सत्र में एक नई विचारधारा का सूत्रपात हुआ। सच्चिदान्द हीरानन्द वात्स्यायन अज्ञेय ने मंद सप्तक और तार सप्तक नामक काव्य संग्रह प्रकाशित किए। यह प्रयोगवादी आंदोलन का घोषणापत्र था, किन्तु इसमें प्रयोगवाद की चर्चा नहीं की गई थीं। इन कवियों ने छायावाद की रूमानियत और प्रगतिवादी कवियों दव्ारा की गई कला की… (160 more words) …

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