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रासो की प्रमाणिकता के पक्ष में विचार

रासों जैसे साहित्यिक श्रेष्ठ प्रबंध काव्य को एकदम जाली और अप्रमाणिक नहीं ठहराया जा सकता। इसमें बहुत कुछ प्रक्षिप्त अंश हैं। इसका मूल रूप साहित्य और भाषा की दृष्टि से महत्वपूर्ण है। इसके लघुतम संस्करण में प्रक्षिप्त अंग नगण्य हैं। मुनि श्री जिनविजय रासो को मूल रूप में छोटा-सा काव्य ही मानते हैं। पुरातन-प्रबंध-संग्रह में ऐसे चार छंद मिले हैं जो रासो की लघुत्तम प्रतियों में भी उपलब्ध होता हैं।

इसकी प्रमाणिकता के संबंध में विदव्ानों में भिन्न-भिन्न मत व्यक्त किए हैं-

  • डॉ. दशरथ उन संदेहों का निराकरण करते हुए लिखते हैं कि मूल रासो न तो जाली ग्रंथ है… (360 more words) …

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हिन्दी साहित्य का इतिहास दर्शन

  • दर्शन: -हिन्दी साहित्य के इतिहास का अर्थ यह है कि देश-काल की सीमाओं में विकसित साहित्य की गतिविधियों का समय अध्ययन है। क्योंकि साहित्य की सृष्टि समाज सापेक्ष होती है। साहित्यकार न केवल अपने युग से प्रभावित होता है बल्कि अपनी रचना से युग और परिवेश पर प्रभाव डालता है। अर्थात्‌ साहित्यकार और युग का अन्योन्याश्रित संबंध हैं।
  • ”साहित्य के अधिकांश इतिहास या तो सामाजिक इतिहास हैं या साहित्य में प्रतिबिंबित विचारों के इतिहास अथवा ये अलग-अलग वृत्तियों से संबंधित प्रभाव और गुण-दोष विचार होते हैंं, जिन्हें काल-समयनुसार व्यवस्थित कर दिया जाता है।”
  • सौन्दर्य के इतिहास लेखन का यह… (171 more words) …

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