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हिन्दी साहित्य के इतिहास का काल-विभाजन और नामकरण

साहित्य निरन्तर बढ़ती हुई धारा के समान होता है, इसलिए युग विशेष में जो नई प्रवृत्तियाँ, नई दिशाएँ और नए संकेत उभरते हैं, वे कभी आकस्मिक नहीं होते हैं उनका जन्म पूर्ववर्ती परम्पराओं से होता है।

परन्तु जिस प्रकार नदी की धारा कई रूप बदलती है, उसी तरह विभिन्न कालों के रूपों में जो परिवर्तन दिखाई देता है, वही उनके नामकरण और विभाजन की प्रेरणा देता है।

काल-विभाजन की दृष्टि से हिन्दी का सर्वप्रथम इतिहास सर जॉर्ज ग्रियर्सन ने ’मॉर्डन लिटरेचर ऑफ हिन्दुस्तान’ नाम से 1889 में लिखा था। ’मिश्रबंधु-विनोद’ ने भी इसी परम्परा का अनुसरण किया है। ग्रीव्ज, आ.… (643 more words) …

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आदिकाल

  • आदिकाल से अद्यावधि हिंदी साहित्य का इतिहास ज्ञानवर्द्धक, विषय-विविधता एवं लोकरंजकता आदि गुणों से भरपूर है। यह संपूर्ण देश के जन-मन को प्रेरणा प्रदान करने वाला है। यह कहना अनुचित न होगा कि हिन्दी साहित्य भारतीय समाज का प्रतिबिंब है। इसका अध्ययन करके हम अपने अतीत और वर्तमान से पूर्णत: परिचित हो सकते हैं और सारे देश की झाँकी देख सकते हैं।
  • हिन्दी भाषा-भारतीयता का प्रतीक हमारी राष्ट्रभाषा हिन्दी हमारे देश की संस्कृति की आत्मा है। हिन्दी साहित्य में राष्ट्र की भावनाओं का प्रतिबिंब दिखाई देता है। इसका आदिकाल से आधुनिक काल तक का साहित्य राष्ट्र की वाणी को… (180 more words) …

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