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हिन्दी साहित्य का इतिहास लेखन की पदव्तियाँ

हिन्दी साहित्य का इतिहास लेखन के क्षेत्र में आचार्य शुक्ल का विशिष्ट स्थान है। परन्तु उन्होंने भी किसी विशेष पद्धति के अनुसार अपने ग्रंथ की रचना नहीं की। वस्तुत: उस समय तक ऐसी कोई मान्यता स्थिर भी नहीं हुई थी। परन्तु उनके पर्ववर्ती तथा बाद में आने वाले लेखकों ने जिन विधि-सिद्धांतों के अधीन साहित्य के इतिहास की रचना की वे निम्न हैं-

  • अकारादि क्रम का सिद्धांत- प्रस्तुत प्रकार के सिद्धांत के प्रयास का श्रेय गार्सांद् तासी नामक फ्रांसीसी विदव्ान को जाता है। उन्होंने फ्रेंच भाषा में हिन्दी साहित्य का इतिहास लिखा ’इस्तवार द ल लित्येत्यूर ऐंटुई ऐ ऐंदुस्तानी’… (296 more words) …

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गद्य-साहित्य

  • आदिकाल में काव्य-रचना के साथ-साथ-रचना की दिशा में भी कुछ स्फुट प्रयास लक्षित होते हैं। ’राउलवेल’ (चम्पू) ’उक्ति-व्यक्ति-प्रकारण’ और ’वर्णरत्नाकर’ इस संदर्भ में उल्लेखनीय रचनाएं हैं।
  • राउलवेल- यह एक शिलांकित कृति है, जिसका पाठ बम्बई के ’प्रिंस ऑफ वेल्स’ संग्रहालय से उपलब्ध कर प्रकाशित करया गया है। विदव्ानों ने इसका रचना-काल 10वीं शताब्दी माना है। यह गद्य-पद्य-मिश्रत चम्पू-काव्य की प्राचीनतम हिन्दी -कृति है। इसकी रचना ’राउल’ नायिका के नखशिख-वर्णन के प्रसंग में हुई है। इस कृति का रचियता रोडा नामक कवि को माना जाता है। राउलवेल से हिन्दी में नखशिख-वर्णन की श्रृंगार-परम्परा आरंभ होती है। इसकी भाषा में हिन्दी की… (460 more words) …

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