CBSE-NET (Based on NTA-UGC) Hindi Literature (Paper-II) हिन्दी साहित्य का इतिहास (History of Hindi Literature)-आदिकाल (Beginning Era) Revision (Page 2 of 15)

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पृथ्वीराज रासो

यह निर्विवाद सत्य है कि रासो-काव्य-परम्परा में पृथ्वीराज रासो का स्थान सर्वोपरि है। जिस प्रकार कृष्ण भक्तिधारा में जो स्थान सूरदास के सूरसागर का है, राम भक्तिधारा में जो महत्व तुलसी के रामचरितमानस को प्राप्त है, वही महत्व रासो-काव्य-परम्परा में पृथ्वीराज रासो को प्राप्त है। विदव्ानों ने इस कृति को हिन्दी के प्रथम महाकाव्य के रूप में स्वीकार किया है। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने इसे हिन्दी का प्रथम महाकाव्य माना है, तो वही स्वर्गीय गुलाब राय ने इसे स्वाभाविक विकासशील महाकाव्य माना है वही

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चन्दबरदाई व्यक्तित्व एवं कृतित्व

  • पृथ्वीराज रासो जैसे लोक-प्रसिद्ध ग्रंथ के रचनाकार ने लोक-प्रसिद्ध, इतिहास-प्रसिद्ध कवि चन्दबरदाई के जीवन-वृत्त के बारे में अनेक संदेह उत्पन्न किये गए हैं। यह आश्चर्य की बात है कि पृथ्वीराज रासो की प्रमाणिकता पर तो प्रश्न-चिन्ह लगाये गये हैं। साथ ही चन्दबरदाई के ऐतिहासिक अस्तित्व और पृथ्वीराज के समय में इसकी उपस्थिति को भी नकारने का दुस्साहस किया जा रहा है।
  • ज्ञातव्य है कि चन्दबरदाई अंतिम हिन्दू सम्राट पृथ्वीराज चौहान का दरबारी कवि और मित्र था। उसका जन्म पृथ्वीराज के साथ वि. सं. 1206 म

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