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जैन साहित्य

  • जिस प्रकार हिन्दी के पूर्वी क्षेत्र में सिद्धों ने बौद्ध धर्म के वज्रयान मत का प्रचार हिन्दी-कविता के माध्यम से किया, उसी प्रकार पश्चिमी क्षेत्र में जैन साधुओं ने भी अपने मत का प्रचार हिन्दी-कविता के माध्यम से किया इन कवियों की रचनाएं आचार, रास, फागु, चरित आदि विभिन्न शैलियों में मिलती हैं। आचार-शैली के जैन-कवियों में घटनाओं के स्थान पर उपदेशात्मकता को प्रधानता दी गयी है। फागु और चरित-काव्य शैली की सामान्यता के लिए प्रसिद्ध है। ’रस’ शब्द संस्कृत-साहित्य में क्रीड़ा और नृत्य से संबंधित था। भरत मुनि ने इसे ’क्रीडनीयक’ कहा है।
  • वात्स्यायन के ’कामसूत्र’ के रचनाकाल तक… (1263 more words) …

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हिन्दी के विकास-क्रम का रूप

  • वैदिक संस्कृत (भारत यूरोपीय कुल के आर्य परिवार की भाषा 1500 ई. पूर्व से पहले)
Understadning the various types of Hindi Language

Understadning the Various Types of Hindi Language

Understadning the various types of Hindi Language

  • हिन्दी 1000 ई. तक अपना स्वरूप ग्रहण कर चुकी थी।

हास्य मिश्रित रासो ग्रंथ

रासो काव्यपरम्परा में हास्य मिश्रित रासो ग्रंथों को भी नहीं भुलाया जा सकता हे। इस वर्ग में आने वाले ग्रंथों में मकाड़ रासों, ऊँदर रासो, खीचड़ रासो और गोधा रासो आदि है। ये सभी रासों ग्रंथ डिंगल भाषा में रचित हैं।

पिंगल या बृजभाषा के रासो ग्रंथ

डिंगल के रासो ग्रंथों की जो परम्परा मिलती है, वैसी ही परम्परा पिंगल के ग्रंथों में भी मिलती है।

पिंगल या ब्रजभाषा में लिखे गए रासो ग्रथों की नामावली इस प्रकार है

Raso Compositions in Pingal or Braj

Raso Compositions written in Pingal or Braj

गिनती

ग्रंथ

रचनाकार

1

हम्मीर रासो

शारंगधर

2… (927 more words) …

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